आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का संदेश–
मनुष्य संकट में घबराता है और अपनी 'बुद्धि' का कपाट बन्द कर लेता है। इससे उसका कष्ट विस्तार पाता रहता है और गहन भी होता रहता है। संकट की घड़ी मे मित्र और स्वजन की पहचान-परख होती है तथा धैर्य की कसौटी पर उसका बहुविध परीक्षण होता रहता है। हूक, टीस, वेदना, सिसक इत्यादिक की गहनता तथा कपोलों पर ढुलकते आँसू के संस्पर्श 'आधि' को द्विगुणित कर देते हैं। इससे चेतन से अधिक 'अवचेतन' समृद्ध होता रहता है, जो प्रत्याशित-अप्रत्याशित रूप मे चेतना के धरातल पर आकर अपनी अदृश्य उपस्थिति अंकित कराता है। वह अनुभव के स्तर पर क्रियाशील रहता है और क्रिया की प्रतिक्रिया होती रहती है।
स्वर-सजनी जब वेदना की रागिनी सुनाती है तब जीवन की पाठशाला का कपाट खुलता-सा प्रतीत होने लगता है और मनुष्य शिक्षित-दीक्षित होने के लिए उसमे प्रवेश करने लगता है। अनुभूति के गह्वर मे पैठने पर जब दु:ख-सुख के संवाद कर्णरन्ध्रों मे प्रवेश करने लगते हैं तब निष्पत्ति के रूप मे छनकर जो तथ्य सम्मुख होते हैं, वे यह रेखांकित करते हैं कि दु:ख भोगने के बाद जब सुख-स्वाद मिलता है तब वह मनुष्य को भौतिकलोक की निरर्थकता के प्रति सजग करता है और जीवन की वास्तविकता को अति समीप से समझने का एक अवसर प्रदान करता है।
मेरे जीवन-व्यापार की सर्वाधिक पूँजी यदि 'पाप' हो तो मै तज्जनित 'दु:ख' को ही प्रथमत: अंगीकार करना चाहूँगा; क्योंकि दु:ख की अनेक कोटि हैं और प्रत्येक का भोग व्यक्तित्व को ठोस आधार प्रदान करता है।
अच्छा-बुरा जीवन-चक्र है और अन्योन्याश्रित भी; जैसे-- निशि के अनन्तर दिवा, तम के पश्चात् पुंज, इसीलिए वे एक-दूसरे को पूर्ण करते हैं। इससे कोई वंचित नहीं रह सका है। हम यदि सुखमय जीवन की ही आकांक्षा करें और दु:ख से स्वयं को अलग करना चाहें तो यह जीवलोक की व्यवस्था के प्रति न्याय नहीं है। दु:ख का उपभोग तो आगे बढ़कर करना चाहिए। इससे मनुष्य निखरता है और उसकी अनुभूति गहन होती है।
अग्नि-शिखा मे स्वर्ण को तपा-तपाकर उसे यातना दी जाती है तब उसका सम्पूर्ण विकार उससे बाहर निकलकर उसे ऐसा द्युतिमय (कान्तिपूर्ण, भास्वर) बनाता है कि उसकी आभा देखते ही बनती है; वैसे ही मनुष्य जब दु:खाग्नि में तपकर जब सामान्यावस्था की प्राप्ति करता है तब उसके व्यक्तित्व की समृद्धि और उसकी चुम्बकीय गुणधर्मिता सभी को आकर्षित करती है और सम्मोहित भी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ जून, २०२२ ईसवी।)