● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल और भारतीय जनता पार्टी के नेता मनोज सिनहा कहाँ तक पढ़े हैं? क्या उनके पास ‘विधिक’ शिक्षा अर्जित करने का प्रमाणपत्र है?
उनका कहना है, “पढ़े-लिखे लोगों को भ्रम है कि गांधी जी (महात्मा गांधी जी) के पास कानून की डिग्री थी, जबकि उनके पास कोई डिग्री नहीं थी। उनकी एकमात्र योग्यता हाईस्कूल डिप्लोमा थी।”

उस कथित उपराज्यपाल ने महात्मा गांधी जी के विषय मे पुन: कहा था, “एक औसत छात्र थे महात्मा गांधी।”
ज्ञातव्य है कि मनोज सिनहा २३ मार्च, २०२३ ई० को ‘आइ० टी० एम०’, ग्वालियर मे डॉ० राममनोहर लोहिया-स्मृति व्याख्यानमाला’ के अन्तर्गत अपने विचार व्यक्त कर रहे थे, जिसमे उन्होंने महात्मा गांधी जी-विषयक अत्यन्त आपत्तिजनक तथ्य प्रस्तुत कर, अपनी रही-सही छवि भी धूल-धूसरित कर दी है।
महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने भी महात्मा गांधी की उच्चकोटि की शैक्षिक डिग्रियों से सम्बन्धित तथ्यों को मनोज सिनहा के पास भेजकर उन्हें लज्जित तो कर ही दिया है। तुषार गांधी ने अनेक ट्वीट करके मनोज सिनहा पर प्रहार कर, उनके महात्मा गांधी जी-विषयक अल्प ज्ञान पर प्रकाश डाल ही दिया है।

अब प्रश्न है, जिस मनोज सिनहा को उत्तरप्रदेश की राजनीति मे उसी की भारतीय जनता पार्टी वालों ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था, वह व्यक्ति महात्मा गांधी जी के पैरों की धूलि के बराबर भी नहीं है। अब तो राज्यपाल ‘कृपापात्र’ के रूप मे बनाये जा रहे हैं। ऐसे लोग यदि विधिक पद राज्यपाल/उपराज्यपाल के पद को, जो कि अब विशुद्ध रूप से ‘राजनीतिक पद’ बना दिया गया है, सँभालेंगे तो यह हास्यास्पद विषय बन ही सकता है।
ग़ाज़ीपुर के निवासी, मनोज सिनहा ‘भारतीय प्रौद्योगिक संस्थान’ (आइ० आइ० टी०), बी० एच० यू०, वाराणसी के विद्यार्थी रहे हैं। वहाँ से उन्होंने बी० टेक्० और एम० टेक्० की उपाधियाँ अर्जित की थीं। इससे अधिक उनकी कोई शैक्षिक योग्यता नहीं रही है।
मनोज सिनहा को अब मालूम हो जाना चाहिए कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने राजकोट (गुजरात) के एल्फ्रेड स्कूल से हाईस्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। उन्होंने इनर टेम्पिल से विधि की उपाधि अर्जित की थी। उन्होंने दो डिप्लोमा अर्जित किये थे :― लैटिन और फ्रेंच-भाषाओं मे।
इधर, भारतीय जनता पार्टी और उससे सम्बन्धित समस्त संघटनो के नेताओं ने राष्ट्रपिता-बापू-सत्य-अहिंसा-प्रेम के पुजारी महात्मा गांधी जी को अपमानित करने का ‘ठीका’ (यहाँ ‘ठेका’ अनुपयुक्त शब्द है।) ले लिया है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ मार्च, २०२३ ईसवी।)