डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
स्वयं पर यदि यहाँ विश्वास हो,
तो रास्ते अनजाने नहीं लगते।
गिरना भी हार जैसा नहीं लगता,
चलते कदम यूँ ही नहीं ठहरते।।
मन में यदि दीपक जलता हो,
संकल्पों का हठ भी पलता हो।
तो काँटों में भी पथ दिखते हैं,
पुष्प शुष्क वन में खिलते हैं।
आँधियाँ राह क्या रोकेंगी,
जब भीतर लहर हो सागर की।
विश्वास जहाँ प्रहरी बन जाए,
हर मुश्किल लगती कागज की।।
स्वयं पर विश्वास हो,
तो पर्वत भी हल्के लगते हैं
सूनी राहों के सन्नाटे
मधुरिम गीत जैसे लगते हैं।।
गिरकर उठना, उठकर चलना,
चलकर फिर आगे बढ़ जाना।
यही विजय का प्रथम मंत्र है,
यही स्वयं को है पहचानना।
जो अपने मन को जीत गया,
वो जग की हर बाज़ी जीता है।
जिसने भय की डोर तोड़ दी,
उसके सम्मुख भाग्य ठिठकता है।।
यदि अपनों पर हो विश्वास,
तो जीवन की राहें और अधिक
सुरक्षित और अधिक उजली,
व अधिक सुगंधित हो उठती हैं।।
जब साथ खड़े हों अपने लोग,
तो धूप भी छाया बन जाती है।
थका हुआ मन फिर से हँसता,
सूनी साँस गीत गुनगुनाती है।
माँ की प्रार्थना, पिता का साहस,
मित्रों का अटूट सहारा,
इनसे ही जीवन बनता है
एक सशक्त उजियाली धारा।।
जीवन रुचिकर हो जाता है,
साँसों से संगीत पनपता है।
शब्दों से पुष्प बरसते हैं,
मंज़िलें कदमों में बिछ जाती हैं।।
फिर हर दिन उत्सव बनता है,
हर क्षण नूतन और सरस लगे।
हर बाधा अवसर बन जाए,
हर संघर्ष जीत के हार सजे।
तब श्रम पूजा हो जाता है,
और कर्म इबादत बनते हैं,
विश्वासों के दृढ़ कंधों पर
सपनों के सत्य सँवरते हैं।।
यदि नयनों में लक्ष्य सजा हो,
और हृदय में हो ज्वाला जीवित।
तो असफलता भी शिक्षा बन
कर देती जीवन को शिक्षित।
हो रात अँधेरी चाहे जितनी,
जब भोर सुनहरी आती है।
विश्वासों की दृढ़ धरती पर
आशा फलीभूत हो जाती है।।
स्वयं पर विश्वास रखो,
अपनों का मान रखो।
फिर देखो यह जीवन कैसे
स्वर्णिम अभियान बनेगा।
कदम-कदम पर फूल खिलेंगे,
श्रम से भाग्य लिखा जाएगा।
और जो कल तक दुर्लभ था,
वो सपना सच हो जाएगा।।
स्वयं पर विश्वास हो,
तो रास्ते अनजाने नहीं लगते।
गिरना भी हार जैसा नहीं लगता,
चलते कदम यूँ ही नहीं ठहरते।।
विश्वास जहाँ जीवन बन जाए,
वहाँ मंज़िल खुद चलकर मिलती है।
और मनुष्य की सहज अंगड़ाई
सफलता का इतिहास रच देती है।।