डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
अयोध्या नगरी उत्सवों से सजी रहती थी। महाराज दशरथ के राज्य में प्रजा सुखी थी। चारों राजकुमार राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न राज्य का प्राण थे। उनमें भी श्रीराम सबसे प्रिय थे। उनका सौम्य स्वभाव, सत्यनिष्ठा और करुणा सभी के हृदय को जीत लेती थी। किन्तु समय का चक्र कब बदल जाए, कोई नहीं जानता। एक दिन वही अयोध्या, जो हर्ष से भरी थी, शोक के अथाह समुद्र में डूब गई। महारानी कैकेयी ने राज्यलोभ के चलते राजा दशरथ से दो वरदान माँगे। एक पुत्र भरत के लिए राजसिंहासन और दूसरा राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास।
राजा दशरथ असहाय हो उठे। वे जानते थे कि राम के बिना उनका जीवन अधूरा है, किन्तु रघुकुल की परम्परा थी। “प्राण जाए पर वचन न जाए।” राम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए प्रसन्न मन से वनवास स्वीकार कर लिया। सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ चल पड़े।
उनके वन गमन के बाद अयोध्या मानो सूनी हो गई। प्रजा विलाप करने लगी। महाराज दशरथ पुत्र-वियोग सह न सके और उन्होंने प्राण त्याग दिए। उधर भरत, जो उस समय ननिहाल में थे, लौटकर जब अयोध्या पहुँचे, तो सब कुछ बदल चुका था। पिता का देहांत, राम का वनवास और माता कैकेयी का कठोर निर्णय—इन सबने उनके हृदय को तोड़ दिया। भरत ने निश्चय किया कि वे किसी भी प्रकार श्रीराम को वापस अयोध्या लाएँगे। गुरु वशिष्ठ, मंत्रीगण, सेना और अयोध्यावासियों के साथ वे चित्रकूट की ओर चल पड़े।
यहीं से आरम्भ होती है वह अद्भुत कथा, जिसमें धर्म और भौतिकवाद आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।
चित्रकूट का वन अत्यंत रमणीय था। मंदाकिनी नदी कल-कल ध्वनि करती बह रही थी। पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को पवित्र बना रहा था। वन के वृक्ष मानो तपस्वियों की भाँति शांत खड़े थे। राम, सीता और लक्ष्मण वहीं एक छोटी-सी कुटिया में निवास कर रहे थे। एक दिन प्रातःकाल लक्ष्मण ने दूर से उठती धूल देखी। वे तुरंत सतर्क हो उठे।
“भैया! लगता है कोई विशाल सेना यहाँ आ रही है।” उन्होंने धनुष उठा लिया। “कहीं भरत हमें मारकर राज्य लेने तो नहीं आ रहा?”
राम मुस्कराए और बोले “लक्ष्मण, भरत ऐसा कभी नहीं कर सकते। उनका हृदय निर्मल है।” कुछ ही देर में भरत वहाँ पहुँचे। राम को देखते ही वे उनके चरणों में गिर पड़े। “भैया! मुझे क्षमा कर दीजिए। यह सब मेरी माता के कारण हुआ।”
राम ने भरत को उठाकर गले लगा लिया। दोनों भाइयों की आँखों से आँसू बहने लगे। सारा वन उस मिलन का साक्षी बन गया।
भरत ने हाथ जोड़कर कहा— “भैया! अयोध्या आपके बिना श्मशान समान हो गई है। पिता भी आपके वियोग में संसार छोड़ गए। अब आप लौट चलिए और राज्य संभालिए।”
राम शांत स्वर में बोले— “भरत, पिता ने मुझे चौदह वर्ष वनवास का आदेश दिया था। मैं उनके वचन का उल्लंघन नहीं कर सकता।”
भरत ने पुनः कहा— “किन्तु वह आदेश अन्यायपूर्ण था। माता कैकेयी मोह में पड़ गई थीं। आप लौटकर प्रजा का कल्याण कीजिए।”
राम ने उत्तर दिया— “अन्यायपूर्ण हो या नहीं, पिता का वचन मेरे लिए सर्वोपरि है।” भरत निरुत्तर हो गए। तभी वहाँ उपस्थित राजमंत्री महर्षि जाबालि आगे बढ़े। वे अत्यंत विद्वान और तर्कशास्त्र के ज्ञाता थे। उन्होंने सोचा— “यदि भावनाओं से राम नहीं मानते, तो तर्कों से उन्हें समझाना होगा।”
जाबालि ने शांत स्वर में कहा— “राम, आप अत्यंत बुद्धिमान हैं। फिर भी आप मोह में बँधकर कष्ट सह रहे हैं। संसार में कोई किसी का सगा नहीं होता। मनुष्य अकेला जन्म लेता है और अकेला ही मर जाता है।” राम ध्यान से उनकी बातें सुनने लगे।
जाबालि आगे बोले— “देखिए, जैसे यात्रियों का समूह किसी धर्मशाला में कुछ समय के लिए ठहरता है और फिर बिछड़ जाता है, वैसे ही माता, पिता, भाई और पुत्र के सम्बन्ध हैं। वे स्थायी नहीं होते।”
उन्होंने चारों ओर फैले वन की ओर संकेत किया। “ये वृक्ष, ये नदियाँ, ये पर्वत—सब परिवर्तनशील हैं। फिर मनुष्य क्यों किसी संबंध के मोह में स्वयं को बाँधे?” भरत और अन्य लोग चुपचाप सुन रहे थे।
जाबालि ने पुनः कहा— “आप पिता के वचन को निभाने के लिए वन में कष्ट भोग रहे हैं, किन्तु सोचिए—क्या यह उचित है? जिस व्यक्ति का शरीर ही अब इस संसार में नहीं रहा, उसके लिए अपना जीवन दुःखमय बनाना कहाँ की बुद्धिमानी है?”
वन में एक क्षण के लिए गहरा मौन छा गया।
जाबालि अब और स्पष्ट होकर बोले— “राम, लोग कहते हैं कि मृत्यु के बाद स्वर्ग और नरक हैं। परन्तु किसने उन्हें देखा है? मनुष्य जब मर जाता है, तो उसका शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है। उसके बाद कुछ नहीं बचता।”
उन्होंने धरती से एक सूखी पत्ती उठाई। “जैसे यह पत्ती वृक्ष से गिरकर मिट्टी बन जाती है, वैसे ही मनुष्य भी मृत्यु के बाद समाप्त हो जाता है।”
लक्ष्मण क्रोधित हो उठे, किन्तु राम ने उन्हें शांत रहने का संकेत दिया।
जाबालि ने अवसर देखकर कहा— “आप जिस वनवास को धर्म समझकर निभा रहे हैं, वह केवल व्यर्थ का कष्ट है। यदि मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता, तो मृत पिता के वचन का बोझ उठाना भी व्यर्थ है।”
भरत की आँखों में आशा की किरण जागी। उन्हें लगा कि शायद अब राम मान जाएँगे।
जाबालि ने अब अपना सबसे प्रभावशाली तर्क प्रस्तुत किया— “राम! आपका जीवन केवल आपका नहीं है। अयोध्या की प्रजा आपको अपना रक्षक मानती है। वे दुःखी हैं। राज्य बिना राजा के दिशाहीन हो गया है।”
उन्होंने भरत की ओर देखकर कहा— “भरत स्वयं आपको राजा बनाना चाहते हैं। जब प्रजा, मंत्री, गुरु और आपका भाई—सब आपको वापस बुला रहे हैं, तो वन में रहना किस काम का?”
वे बोले— एक राजा का कर्तव्य है कि वह प्रजा को सुख दे। जंगल में तपस्या करना आपका धर्म नहीं, बल्कि राजधर्म का त्याग है। आप लौटिए, राजसिंहासन स्वीकार कीजिए और अयोध्या को पुनः समृद्ध बनाइए।
उनके शब्दों में गहरा तर्क और प्रभाव था। सभी की दृष्टि अब राम पर टिक गई।
जाबालि की बातें सुनकर राम का मुख गंभीर हो उठा। उनकी आँखों में तेज चमकने लगा।
उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा— “महर्षि! मुझे आश्चर्य है कि आप जैसे विद्वान व्यक्ति ऐसी बातें कर रहे हैं।” वन का वातावरण अचानक गंभीर हो गया।
राम बोले— यदि मनुष्य केवल भौतिक सुखों को ही सत्य मान ले और धर्म को त्याग दे, तो समाज का क्या होगा? उन्होंने आगे कहा— सत्य ही संसार का आधार है। सूर्य सत्य के कारण उदित होता है। पृथ्वी सत्य के कारण स्थिर है। राजा का सम्मान और प्रजा का विश्वास भी सत्य पर ही टिके होते हैं। राम के शब्दों में अद्भुत शक्ति थी।
राम ने जाबालि की ओर देखते हुए कहा— मैंने पिता के वचन की रक्षा का प्रण लिया है। यदि मैं आज अपने स्वार्थ के लिए उस वचन को तोड़ दूँ, तो संसार में कौन अपने पिता पर विश्वास करेगा?
उन्होंने भरत की ओर प्रेम से देखा। भरत! राज्य से बड़ा धर्म है। यदि राजा ही अपने वचन से मुकर जाए, तो प्रजा भी अधर्म का मार्ग अपनाने लगेगी। राम ने आगे कहा कि रघुकुल की परम्परा सत्य पर आधारित है। हमारे पूर्वजों ने अपने प्राण त्याग दिए, परन्तु वचन नहीं तोड़ा।
उनका स्वर और भी गंभीर हो गया। वह बोले यदि मैं आज अयोध्या लौट जाऊँ, तो यह केवल एक पुत्र का पतन नहीं होगा, बल्कि धर्म की हार होगी। भरत की आँखों से आँसू बहने लगे।
राम ने जाबालि के तर्कों का उत्तर देते हुए कहा कि आप कहते हैं कि मृत्यु के बाद कुछ नहीं रहता। यदि ऐसा ही हो, तो मनुष्य पाप करने से क्यों डरेगा? फिर कौन धर्म का पालन करेगा?”
उन्होंने कहा जो केवल दृश्यमान जगत को ही सत्य मानते हैं, वे आत्मा की शक्ति को नहीं समझते। शरीर नश्वर है, परन्तु आत्मा अमर है। वन में बहती मंद हवा भी मानो राम के शब्दों को सुन रही थी।
राम बोले नास्तिकता मनुष्य को स्वार्थी बनाती है। ऐसा व्यक्ति केवल अपने सुख के लिए जीता है। किन्तु धर्म मनुष्य को त्याग और कर्तव्य सिखाता है। उन्होंने कठोर स्वर में कहा कि यदि समाज से धर्म समाप्त हो जाए, तो मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं रहेगा। यह सुनकर जाबालि मौन हो गए।
राम की धर्मनिष्ठा देखकर जाबालि का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने विनम्र स्वर में कहा कि राम, मुझे क्षमा करें। मैंने जो कुछ कहा, वह केवल आपको अयोध्या लौटाने के लिए कहा था। वास्तव में मैं धर्म का विरोधी नहीं हूँ। उन्होंने सिर झुका लिया। मैं जानता हूँ कि आप सत्य और धर्म के प्रतीक हैं। आपके समान मर्यादा का पालन करने वाला कोई नहीं। गुरु वशिष्ठ भी आगे आए।
उन्होंने कहा— राम, जाबालि ने जो कहा, वह केवल नीति के अनुसार था। उनका उद्देश्य अधर्म फैलाना नहीं था। राम का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने जाबालि को आदरपूर्वक प्रणाम किया और कहा कि महर्षि, मैं आपके ज्ञान का सम्मान करता हूँ। किन्तु धर्म से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं।
जब भरत ने देखा कि राम किसी भी प्रकार लौटने को तैयार नहीं हैं, तो उन्होंने कहा कि यदि आप नहीं लौटेंगे, तो मैं भी अयोध्या का राज्य स्वीकार नहीं करूँगा।
राम ने उन्हें समझाया और कहा भरत! यह भी तुम्हारा धर्म है कि तुम राज्य की रक्षा करो।
भरत ने विनम्रतापूर्वक कहा कि तब मुझे आपकी चरण पादुकाएँ दे दीजिए। मैं उन्हें सिंहासन पर रखकर आपकी ओर से राज्य चलाऊँगा। राम ने अपनी पादुकाएँ भरत को दे दीं। भरत ने उन्हें सिर पर धारण किया। उस क्षण पूरा चित्रकूट भावविभोर हो उठा।
भरत अयोध्या लौट गए, किन्तु उन्होंने स्वयं को राजा नहीं माना। वे केवल राम के प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाने लगे। उधर राम वन में रहकर अपने धर्म का पालन करते रहे। राम और जाबालि का यह संवाद केवल दो व्यक्तियों का विवाद नहीं था। यह दो विचारधाराओं का सामना था जिसमे एक ओर भौतिक सुख और तर्क का मार्ग और दूसरी ओर सत्य, वचन और धर्म का मार्ग था। परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपने नैतिक कर्तव्यों और सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि अपने वचन, कर्तव्य और आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठा है और यही कारण है कि श्रीराम केवल एक राजा नहीं, बल्कि “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहलाए।