डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
न हमें कोई समझा, न समझा भावनाएँ,
भरी-पूरी दुनिया में हम हैं अकेले।
कहने को रिश्ते अनेकों यहाँ हैं,
जिधर देखता हूँ उधर दिखते मेले।
हर तरफ ताकते-झाँकते लोग दिखते,
जहाँ देखो दिखते यहाँ पर झमेले।
न हमें कोई समझा, न समझा भावनाएँ,
भरी-पूरी दुनिया में हम हैं अकेले।।
हँसी ओढ़कर लोग ग़म को छिपाते,
सभी अपने चेहरे पे चेहरे लगाए।
फुर्सत किसे है कि मन की सुने वे,
सभी अपने हिस्से के किस्से सुनाएँ।
यहाँ शब्द ज्यादा मगर अर्थ कम हैं,
सभी व्यस्त सपनों मे कई खेल खेले।
न हमें कोई समझा, न समझा भावनाएँ,
भरी-पूरी दुनिया में हम हैं अकेले।।
चाहा था हमने भी दिल खोलकर के,
मगर ना सुनी उसने न बात मानी।
मगर हर दफा बात अधरों पे ठहरी,
मिला दर्द दिल का वफा की निशानी।
जो आँखों ने बोला, न समझा किसी ने,
मगर सब के लब पर थे हमारे गिले।
न हमें कोई समझा, न समझा भावनाएँ,
भरी-पूरी दुनिया में हम हैं अकेले।।
न शिकवा किसी से, न कोई शिकायत,
यही सोचकर मुस्कुराना पड़ा है।
जिसे अपना समझा वही निकला सपना,
हमें फर्ज-ए-यारी निभाना पड़ा है।
समय ने सिखाया कि चुपचाप रहना,
नहीं हर किसी को दिखाने हैं छाले।
न हमें कोई समझा, न समझा भावनाएँ,
भरी-पूरी दुनिया में हम हैं अकेले।।
मगर फिर भी उम्मीद जीवित है मन में,
कहीं तो कभी कोई अपना भी होगा।
जो शब्दों से पहले ही पीड़ा को समझे,
जो रिश्तों से बढ़कर सहारा भी होगा।
उसी एक को हर जगह खोजता हूँ,
हमारे कदम अब चल रहे हैं अकेले।
न हमें कोई समझा, न समझा भावनाएँ,
भरी-पूरी दुनिया में हम हैं अकेले।
कहने को रिश्ते अनेकों यहाँ हैं,
मगर दर्द अपना उठाते अकेले।।
न हमें कोई समझा, न समझा भावनाएँ,
भरी-पूरी दुनिया में हम हैं अकेले।