डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
भारतीय दर्शन का मूल आधार यह है कि परम सत्य सीमित नहीं है। उसे न केवल किसी एक नाम, रूप, स्थान या उपासना-पद्धति में बाँधा जा सकता है और न ही केवल तर्क द्वारा पूर्णतः समझा जा सकता है। वेद, उपनिषद, भगवद्गीता और संत साहित्य ईश्वर को ऐसी अनन्त सत्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसकी कृपा से मनुष्य का अज्ञान दूर होता है और जीवन का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है।
इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा गया है—
“ईश्वर वह है जिसकी कृपा से सारे भ्रम मिट जाते हैं। जिनका आदि और अंत कोई नहीं जान पाया।”
यह कथन हमें स्मरण कराता है कि परमात्मा समय, स्थान और कारण-कार्य की सीमाओं से परे है। इसलिए उसे केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना और आत्मानुभूति से जाना जा सकता है।
उपनिषदों में ब्रह्म का वर्णन अनेक विरोधाभासी प्रतीकों द्वारा किया गया है—
“बिना पैरों के चलता है, बिना कानों के सुनता है, बिना हाथों के कार्य करता है, बिना जिह्वा के सभी रसों का अनुभव करता है, बिना वाणी के बोलता है, बिना आँखों के देखता है और बिना नाक के सभी गंधों को ग्रहण करता है।”
प्रथम दृष्टि में यह वर्णन असंभव प्रतीत होता है, किन्तु इसका उद्देश्य ईश्वर को चमत्कारी सिद्ध करना नहीं, बल्कि यह समझाना है कि परम चेतना इन्द्रियों पर निर्भर नहीं है। मनुष्य शरीर के माध्यम से अनुभव करता है, जबकि ईश्वर समस्त अनुभवों का मूल आधार है।
श्वेताश्वतर उपनिषद (3.19) में कहा गया है—
“अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।”
अर्थात् परमात्मा बिना हाथ-पैर के भी ग्रहण करता है, बिना आँखों के देखता है और बिना कानों के सुनता है। यह कोई शारीरिक वर्णन नहीं, बल्कि उसकी सर्वशक्तिमत्ता और सर्वव्यापकता का दार्शनिक संकेत है।
भारतीय दर्शन की एक विशेषता यह है कि वह निराकार और साकार को परस्पर विरोधी नहीं मानता।
यजुर्वेद (40.8) कहता है—
“स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्…
अर्थात् वह परमात्मा सर्वत्र व्याप्त, शरीररहित, निष्कलंक और शुद्ध है।
दूसरी ओर, भगवद्गीता (4.8) में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”
अर्थात् धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। इन दोनों कथनों में कोई विरोध नहीं है। भारतीय दर्शन के अनुसार परमात्मा अपने मूल स्वरूप में निराकार है, किन्तु भक्तों की भावना, धर्म की आवश्यकता और लोककल्याण के लिए साकार रूप में भी प्रकट हो सकता है।
प्रकृति स्वयं इस सत्य को समझाने वाली एक महान गुरु है। गुरुत्वाकर्षण दिखाई नहीं देता, पर सम्पूर्ण पृथ्वी उसी के नियम पर स्थित है। वायु दिखाई नहीं देती, पर उसका स्पर्श प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है। विद्युत दिखाई नहीं देती, किन्तु उसी से असंख्य यंत्र संचालित होते हैं।
इसी प्रकार चेतना भी आँखों से दिखाई नहीं देती, परन्तु उसी के कारण शरीर जीवित रहता है। जब चेतना शरीर से अलग हो जाती है, तब वही शरीर निष्क्रिय हो जाता है। ये उदाहरण ईश्वर का प्रमाण नहीं, बल्कि यह समझने के साधन हैं कि प्रत्येक प्रभाव के पीछे कोई अदृश्य कारण भी हो सकता है।
भगवद्गीता (13.27) में कहा गया है—
“समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।”
अर्थात् परमेश्वर सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित है।
इसी भाव को ईशावास्य उपनिषद उद्घोषित करता है—
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”
अर्थात् इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से आच्छादित है। यदि यही दृष्टि विकसित हो जाए, तो जाति, भाषा, सम्प्रदाय और प्रजाति के भेद गौण हो जाते हैं। तब करुणा, सेवा, अहिंसा और परस्पर सम्मान केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सत्य बन जाते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास ने भी निराकार और साकार के समन्वय को अत्यन्त सरल भाषा में व्यक्त किया है—
“सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा।
गावहिं मुनि पुरान बुध वेदा॥”
अर्थात् सगुण और निर्गुण में वास्तव में कोई भेद नहीं है; मुनि, पुराण, विद्वान और वेद सभी यही कहते हैं। यह समन्वय भारतीय संस्कृति की अद्वितीय विशेषता है। यहाँ उपासना के अनेक मार्ग हैं, परन्तु लक्ष्य एक ही है—परम सत्य का अनुभव।
ईश्वर का निराकार स्वरूप हमें यह सिखाता है कि सत्य किसी सीमा में बँधा नहीं है, और उसका साकार स्वरूप यह बताता है कि वही सत्य प्रेम, करुणा और धर्म के रूप में जीवन में उतर सकता है। जब मनुष्य यह अनुभव करने लगता है कि वही परम चेतना प्रत्येक जीव में प्राणरूप से विद्यमान है, तब उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। वह केवल पूजा करने वाला व्यक्ति नहीं रहता, बल्कि सत्य, करुणा, सेवा और समभाव का साधक बन जाता है।
अन्ततः ईश्वर को केवल शब्दों से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव, आत्मचिन्तन और साधना से जाना जा सकता है। भारतीय ऋषियों का संदेश यही है कि जो चेतना सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है, वही हमारे भीतर भी विद्यमान है। उसी की अनुभूति अज्ञान से ज्ञान, अशान्ति से शान्ति और सीमित अहंकार से अनन्त अस्तित्व की ओर ले जाती है।