एक गीत चलते-चलते : अपमानों के गरल, कण्ठ कितना सहते ?

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद से प्रयागराज)

बेमतलब के रिश्तों सङ्ग कितना  रहते?
अपमानों के गरल कण्ठ कितना सहते?
सबने है मुझको बेग़ैरत-सा समझा;
मैं ही था जो रिश्तों में था बैठा उलझा।
बिन समझे मुझको उलझन में छोड़ दिया;
बस  दुन्यावी  चकाचौंध से होड़ किया।
कैसी सुन्दर तस्वीर जहां की थे समझे?
वर्षों बीत गये जब थे होटों से बिहसे ।
आखिर पथराई आँखों से झरने कितना झरते?
अपमानों के गरल कण्ठ कितना सहते?
प्यार-वफ़ा के चक्कर में सब पड़ के बिगड़ गये;
जाने कितने अपने ही माँ-बापों को निगल गये।
मेलों में हमको ढोने वाले कन्धे हैं क्यों झुके हुये?
सरदी-गरमी से ढकने वाले आँचल क्यों रुके हुये?
जिनकी उँगली थी थामी हमने जाने कब का छोड़ दिये;
जाने धारा को उसकी गति से हमने कब मोड़ दिये?
इतने पर भी हम हसरत कितना रखते?
अपमानों के गरल कण्ठ कितना सहते?
पूनम का निखरा चाँद हमें बेकार लगे;
तन ढीला और मन बिलकुल बेज़ार लगे।
मुश्किल के हर क्षण में हिम्मत बाँधी हमने;
बिगड़ी बातों को जब-तब थी साधी हमने।
एक उदर ने ही तो हम सबको था जन्मा;
उन आँखों में आँसू दे कर के भी दिल न पिघला।
हम हम होते तो आख़िर निष्ठुर कितना रहते?
अपमानों के गरल कण्ठ कितना सहते?