गीत – ग़ज़लों में सिमटी कहानी



ग़ज़लों  में सिमटी कहानी;
    प्रेम कैसे उपन्यास होगा?
   दूरियाँ  बढ़  गई  हैं  दिलों  की;
   अब कहाँ स्वाँस-विन्यास होगा?
  
    गीत ग़ज़लों……..

  मन  में  उठते  हैं   ऊँचे  बवण्डर;
    हृदय में पतझड़ का एहसास होता।
    दुःख  का झरना निगाहों से बहता;
    कोई समझने को नहीं पास होता।
    यों अकेले ही बोझिल हुए जा रहे;
    उनके बिन ही चरणन्यास होगा।
    अब कहाँ स्वाँस-विन्यास होगा?
   
    गीत ग़ज़लों……..

    दिल  अड़ा है   शिशुपाल   जैसे;
    कुछ ख़ुशी कुछ अचम्भित हुए हैं।
    सिर     मिथ्या   विचारों  के कैसे-
    होंगे खण्डित जो दम्भित हुए हैं।
    रचने  को  नित महाभारतों  को;
    अब कहाँ फ़िर कोई व्यास होगा?
    अब कहाँ स्वाँस-विन्यास होगा?

    गीत ग़ज़लों……..

    भ्रम  कहूँ  या  कह  दूँ  विवशता;
     आँख मानो   पत्थर  जड़ित  हैं।
     हुई   भावना  पे  मेरे  ओलावृष्टि;
     पथ  में  झंझावतों  की तड़ित हैं।
      सुर  है   बिखरे  पड़े  वेदना   से ;
     भला गीत का कैसे अभ्यास होगा?
     अब कहाँ स्वाँस-विन्यास होगा?
   
     गीत ग़ज़लों……..

     ©जगन्नाथ शुक्ल…✍
     (प्रयागराज)