गीत – ग़ज़लों में सिमटी कहानी
ग़ज़लों में सिमटी कहानी; प्रेम कैसे उपन्यास होगा? दूरियाँ बढ़ गई हैं दिलों की; अब कहाँ स्वाँस-विन्यास होगा? गीत ग़ज़लों…….. मन में उठते हैं ऊँचे बवण्डर; हृदय में पतझड़ का एहसास होता। दुःख का झरना […]
ग़ज़लों में सिमटी कहानी; प्रेम कैसे उपन्यास होगा? दूरियाँ बढ़ गई हैं दिलों की; अब कहाँ स्वाँस-विन्यास होगा? गीत ग़ज़लों…….. मन में उठते हैं ऊँचे बवण्डर; हृदय में पतझड़ का एहसास होता। दुःख का झरना […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद से प्रयागराज) बेमतलब के रिश्तों सङ्ग कितना रहते? अपमानों के गरल कण्ठ कितना सहते? सबने है मुझको बेग़ैरत-सा समझा; मैं ही था जो रिश्तों में था बैठा उलझा। बिन समझे मुझको उलझन […]
राघवेन्द्र कुमार “राघव”- मृत्तिका निर्मित दिये से है अमावस काँपती । जलते हुए नन्हें दिये से डरकर निशा है भागती । दीपक देह की अभिव्यंजना से […]
‘शारदेय’ सुषमा श्रीवास्तव, कानपुर, उत्तर प्रदेश जब-जब रंग बदलता मौसम, तब तब तुम याद आते हो, जब जब ठोकर खाती हूँ, तुम अश्कों में मुस्काते हो। मौसम की तरह तुम भी बदले, यह सोच के […]
ऐ मेरे वतन के लोगों गीत की गिटार पर सौरभ पटेल की मोहक प्रस्तुति…………………..
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- रात-दिन उधियइले तहार बबुआ, करेजवा जरवइले तहार बबुआ। ना बुझाला सुझाला ऊ बौका के अब अन्दाजा गरई पकड़े तहार बबुआ। खेत-खरिहान बेचले जेवरवो के ऊ, धूरि आँखी में झोंकले तहार बबुआ। गाँव-नगरी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सब केहू से अझुरइली तहार बबुनी, घर-अँगना भहरइली तहार बबुनी। मांग पोछाते उ नवका संंघतिया धइली, मुँह करिखा लगइली तहार बबुनी। अइसन कइली पढ़इया सहरिया में ऊ, बावन भतरी कहइली तहार बबुनी। […]
पवन कश्यप (हरदोई) तेरी इन झील सी आंखों में जो ये नूर दिखता है, तेरे चेहरे की मदहोशी में ये मन चूर दिखता है । कहीं जुल्फों का गिर जाना, कहीं अधरों का खिल जाना […]