गीत – ग़ज़लों में सिमटी कहानी

February 8, 2019 0

ग़ज़लों  में सिमटी कहानी;    प्रेम कैसे उपन्यास होगा?   दूरियाँ  बढ़  गई  हैं  दिलों  की;   अब कहाँ स्वाँस-विन्यास होगा?      गीत ग़ज़लों……..   मन  में  उठते  हैं   ऊँचे  बवण्डर;    हृदय में पतझड़ का एहसास होता।    दुःख  का झरना […]

एक गीत चलते-चलते : अपमानों के गरल, कण्ठ कितना सहते ?

November 13, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद से प्रयागराज) बेमतलब के रिश्तों सङ्ग कितना  रहते? अपमानों के गरल कण्ठ कितना सहते? सबने है मुझको बेग़ैरत-सा समझा; मैं ही था जो रिश्तों में था बैठा उलझा। बिन समझे मुझको उलझन […]

मृत्तिका निर्मित दिये से है अमावस काँपती

November 4, 2018 0

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- मृत्तिका निर्मित दिये से है अमावस काँपती । जलते हुए नन्हें दिये से डरकर निशा है भागती ।   दीपक देह की अभिव्यंजना से                 […]

गीत : तुम अश्कों में मुस्काते हो

October 13, 2018 0

‘शारदेय’ सुषमा श्रीवास्तव, कानपुर, उत्तर प्रदेश जब-जब रंग बदलता मौसम, तब तब तुम याद आते हो, जब जब ठोकर खाती हूँ, तुम अश्कों में मुस्काते हो। मौसम की तरह तुम भी बदले, यह सोच के […]

गर्लफ्रेंडन में नथइले तहार बबुआ

February 16, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- रात-दिन उधियइले तहार बबुआ, करेजवा जरवइले तहार बबुआ। ना बुझाला सुझाला ऊ बौका के अब अन्दाजा गरई पकड़े तहार बबुआ। खेत-खरिहान बेचले जेवरवो के ऊ, धूरि आँखी में झोंकले तहार बबुआ। गाँव-नगरी […]

मन सहकल बनि गइली तहार बबुनी

February 14, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सब केहू से अझुरइली तहार बबुनी, घर-अँगना भहरइली तहार बबुनी। मांग पोछाते उ नवका संंघतिया धइली, मुँह करिखा लगइली तहार बबुनी। अइसन कइली पढ़इया सहरिया में ऊ, बावन भतरी कहइली तहार बबुनी। […]

गीत- तेरी इन झील सी आंखों में…

January 29, 2018 0

पवन कश्यप (हरदोई) तेरी इन झील सी आंखों में जो ये नूर दिखता है, तेरे चेहरे की मदहोशी में ये मन चूर दिखता है । कहीं जुल्फों का गिर जाना, कहीं अधरों का खिल जाना […]