● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
बीभत्स चरित्रधारी!
तुम्हारा चेहरा
आज दल-परिवर्त्तन करता-सा दिख रहा है।
तुम्हारी अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा के कुकृत्य
पैवन्द लगीं चादरें सुना रही हैं।
लोलुपता और लिप्सा
तुम्हारे चरित्र की पटकथा को
आमिषाशी बना रही हैं
तुम निष्ठुर और नृशंस बन चुके हो।
तुम्हारे भीतर का नितान्त निर्दय जीव
तुम्हें पापजीवी बनाने की कला मे
शिक्षित-दीक्षित कर चुका है।
तुम जीवन-मृत्यु के मध्य
समीकरण बनाने की कला
सीखकर भी सीख न पाये
क्योंकि परख और समझ को
तुमने दो समानान्तर रेखाओं मे बाँटकर देखा है।
स्वर मे माधुर्य का अनुलेपन
और मन-मस्तिष्क मे
विषाक्त षड्यन्त्र का प्रासाद निर्मित कर
तुमने जो भूल की है
समय-शिला पर
पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त का अनुभव
तुम्हें ही करना है,
जहाँ से तुम्हारा पलायन
निर्विकल्प सिद्ध होता लक्षित होगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ मई, २०२२ ईसवी।)