क्या सरकारी बैंक देते है जाति आधार पर Education Loan, 6 महीने SBI के चक्कर काटने के बाद छात्र ने लिखा Suicide Note

राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’-

  • तुम सामान्य कैटेगरी में पैदा हुए हो तो अब ऐसे ही भटकोगे, कोई तुम्हारी बात नहीं सुनेगा

सरकार युवाओं के लिए कितनी भी योजनाए क्यों न ले आएं, लेकिन सरकारी बैंकों की कार्यप्रणाली और कर्मचारियों के असंवेदनशील रवैये की शिकायत सुनने में अक्सर आती है । पर हद तो तब है जब किसी छात्र को उनकी इस लचर कार्य प्राणली का खामियाज़ा अपनी जान देकर भुगतना पड़े।

मामला मध्यप्रदेश के मेडिकल छात्र का है जो आज सोशल मीडिया पर Suicide Note लिखने पर मजबूर है। शिवांकित तिवारी मध्यप्रदेश के सतना जिले का निवासी हैं। जो फिलहाल जबलपुर में “विजया श्री आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल” से आयुर्वेदिक चिकित्सक की पढ़ाई कर रहा है। मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले शिवांकित ने कॉलेज की फीस जमा करने के लिए स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में दिसंबर 2018 को एजुकेशन लोन के लिए अप्लाई किया था।

indianvoice24.com से बात करते हुए शिवांकित ने कहा कि बैंक उन्हें पिछले 6 महीने से चक्कर लगवा रहा है। उन्हें 6 महीनों से लगातार लोन का आश्वासन देने के बाद आज अचानक से बैंक ने लोन देने से मना कर दिया।

शिवांकित ने बताया कि इस लोन के कारण वो कई महीनों तक ठीक से कॉलेज नहीं जा सका और एग्जाम से ठीक पहले बैंक द्वारा लोन देने इंकार के बाद उनका भविष्य अंधकार में पड़ गया है। इन सभी चीजों से परेशान शिवांकित ने फेसबुक पर बैंक व प्रशासन को लताड़ लगाते हुए एक पोस्ट लिखा है। और इस पोस्ट में उन्होंने खुदखुशी की खुली धमकी दी है।

जब श्राप साबित हुआ सामान्य होना:-

शिवांकित के अनुसार बैंक कर्मियों का रवैया बेहद बुरा था। वे सुबह से शाम तक बैठाए रखने के बाद हर बार अगली तारीख थमा देते थे। शिवांकित ने बताया कि कई बार उससे बैंक कर्मचारियों ने कहा, ‘तुम सामान्य कैटेगरी में पैदा हुए हो तो अब ऐसे ही भटकोगे, कोई तुम्हारी बात नहीं सुनेगा न ही तुम्हारी बातों पर ध्यान दिया जाएगा। indianvoice24.com से बात करते हुए शिवांकित ने कहा कि ‘मेरा क्रेंद और राज्य की वादाखिलाफी वाली सरकार से सवाल है कि क्या सारी सुविधाएं और सेवाएं केवल एक विशेष जाति वालों के लिए हैं। हम क्या सामान्य कैटेगरी के लोगो के लिए कोई विकल्प नहीं है ? क्यों हर जगह हमारे साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार किया जाता है? क्यों हमें भी वरीयता नहीं दी जाती है ?

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब सभी जब एक जैसी ही स्कूल/कालेजों से एक साथ शिक्षा ले रहे है, एक साथ एक ही जैसे पाठ्यक्रमों को पढ़ रहे है,  एक ही जैसे पास/फ़ेल हो रहे हैं, एक ही साथ समय बिता रहे है तो फिर वहां पर जातिगत रूप से भेदभाव क्यों किया जाता है ? वहां विद्यार्थियों को क्यों अलग-अलग कैटेगरी में बांटा जा रहा है? वहां तो सभी एकमेव हैं । एक साथ हैं । फिर क्यों सुविधाओं, योजनाओं और लाभों से सामान्य वंचित किया जाता है ?

शिवांकित का कहना यह भी है कि सरकारी कदाचार की वजह से मैं अपने अधिकार से वंचित किया जा रहा हूं । मगर मैं आवाज़ इसलिए उठा रहा हूँ ताकि मेरी ये आवाज़ मेरे ही जैसे किसी और लड़के का सपना ना तोड़ दे । जो कि मेरे ही जैसे सपने लेकर एजुकेशन लोन के लिए बैंको के चक्कर काट रहा है । सरकार को इस व्यवस्था को और इस रवैए को सुधारना होगा । ताकि किसी और छात्र को मजबूरन शरीर त्यागने पर मजबूर ना होना पड़े।

‘मैं शिवांकित तिवारी मध्यप्रदेश के सतना जिले का निवासी हूं। मैं वर्तमान में जबलपुर में “विजया श्री आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल” से आयुर्वेदिक चिकित्सक की पढ़ाई कर रहा हूं। मैं बहुत ही मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखता हूं लेकिन मैंने अपने सपने के निमित्त ही निजी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश ले लिया था, अब समस्या आई की आगे की फीस कैसे चुकाई जाये तो मैंने स्टेट बैंक में अप्लाई किया दिसम्बर के महीने में।

आज पूर्णत: 6 महीने पूरे हो चुके है न ही आज तक मुझे लोन मिला न मेरी समस्या को बारीकी से सुना या समझा गया। बस मुझे झूठा आश्वासन मिला और मेरे बहुमूल्य समय को व्यर्थ में ही नष्ट किया गया। मैं 2 महीने से न तो कालेज जा पा रहा हूं न ही मेरी पढ़ाई हो रही है बस बैंको में दौड़ते – दौड़ते मेरी एडियां घिस रही है,कालेज इसलिए नहीं जा पा रहा हूं क्योंकि मेरी द्वितीय वर्ष की फीस पूर्णतः जमा नहीं है तो कालेज वाले भी बैठने से वंचित कर रहे है। अतः मेरे 2 महीने के समय का पूर्णतया दुरूप्रयोग हुआ है,न ही मैं पढ़ पाया हूं,ना ही मेरा लोन पास हुआ है। अब सवाल मेरा देश की लचर सरकार से है और देश की लाचार बैंक व्यवस्था से है जो एक आम नागरिक को उसके अधिकार से वंचित कर रही हैं जिसका शिकार हम जैसे मध्यम वर्गीय परिवार के लोगों को उठाना पड़ रहा है। वैसे तो सरकार की लाखों योजनाएं है जो विद्यार्थियों के हित के लिए तत्पर है तो फिर क्यों हम जैसे लोग आर्थिक परिस्थितियों की वजह से शिक्षा से वंचित रह जाते है।

आज सरकार की बहुत सारी योजनाएं है जो उच्च शिक्षा ऋण आसानी से उपलब्ध करा रही है फिर क्यों मुझे 6 महीनों तक बैंको के चक्कर लगाने पड़ रहे है ??? आज मेरा भरोसा उठ गया इन निकम्मी सरकारों और लाचार शिक्षा व्यवस्था से जो रहीसो के पैरों की जूती है और हम जैसे लोगों को शिक्षा वंचित कर रही है ?? अब मेरे पास कोई विकल्प नहीं बचा और ना ही घर की आर्थिक स्थिति इतनी सुदृढ़ है कि तुरन्त कालेज में शिक्षा शुल्क जमा करा सकूं। अतः आज मेरे पास ना कोई विकल्प बचा है और न ही कोई स्रोत तो अब मैं क्या करू और किससे कहूं ??

अब सिर्फ और सिर्फ शरीर त्याग करना ही एकमात्र विकल्प रह गया है। देश के तमाम बड़े नेताओं और देश के सर्वोच्च शिखर पर बैठे नेताओं से सीधा संवाद !! अगर इसी तरह रहा तो सिर्फ रहीसो को ही पढ़ने लिखने का हक मिलेगा और हम जैसे लोग आर्थिक परिस्थितियों की वजह से बहुत पीछे छूट जाएंगे। सवाल आज देश की सरकार से है और उसके इस लाचार रवैये से है ?? यकीनन जबाब नहीं मिलेगा फिर भी अब ये लड़ाई जारी रहेगी ये चिंगारी जरूर ज्वाला का रूप लेगी। शेयर करे यदि सहमत हो तो…’

शिवांकित तिवारी का फेसबुक पोस्ट: