— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
हृदय में जब न ‘हर्ष’ हो और न ही ‘विषाद’ तब की स्थिति ‘आनन्द’ है। ऐसी मनोदशा ‘स्थितिप्रज्ञ’ की कोटि के अन्तर्गत रेखांकित होती है। एक वास्तविक संन्यासी (कदाचित् यत्र-तत्र लक्षित हो सके।) स्वयं को ‘आनन्द’ की स्थिति में पाता है; शेष ‘आनन्द-अनुभूति’ की अभिव्यक्ति मिथ्या-मात्र है। वस्तुतः ‘आनन्दानुभूति’ अभिव्यक्ति से परे होती है। उस अवस्था को इस दृष्टान्त से समझा जा सकता है :—–
सीता-स्वयंवर का अवसर है। सभी योद्धा (राजा-महाराजा) जनक के प्रतिज्ञानुसार शिव-धनुष ‘पिनाक’ को उठाकर सीता-संग ब्याह रचाने के लिए ‘स्वयंवर’ में पधारे हुए हैं। उस वैवाहिक अनुष्ठान में गुरु विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण का भी आगमन हुआ है। वे दोनों एक ओर स्वस्थ भाव के साथ अविचलित बैठे हुए हैं। उस धनुष यज्ञ में निमन्त्रित समस्त योद्धा क्रमश: सीता के उस प्रिय+ धनुष को तिल-मात्र हिलाने तक में जब असमर्थ हो जाते हैं तब राजा जनक अपना आक्रोशपूर्ण नैराश्य को इस रूप में प्रकट करते हैं– मुझे ज्ञात हो गया है कि यह पृथ्वी वीर-विहीन है, अतः हे योद्धाओ! अब आप लोग अपने-अपने घर जायें; मैंने समझ लिया है कि वैदेही का विवाह होना विधाता ने नहीं लिखा है।
इतना सुनते ही, लक्ष्मण आक्रोशमय मुद्रा में आ जाते हैं; किन्तु अग्रज राम का अनुशासन मानकर वे शान्त हो जाते हैं। गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाते ही, राम अपने स्थान से उठ खड़े होते हैं; गुरुवर्य विश्वामित्र का चरणस्पर्श करते हैं और उस शिव-धनुष को प्रणाम कर, उसे उठा लेते हैं और उस पर प्रत्यंचा चढ़ाकर विदेह के स्वयंवर अनुष्ठान को सम्पूर्ण करते हैं। ‘राम-द्वारा धनुष उठाने और उस पर प्रत्यंचा चढ़ाते समय राम की जो मनःस्थिति रहती है, उसका वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ‘श्री रामचरितमानस’ में इस प्रकार करते हैं, ”हरसि बिसादि न कछु उर लयऊ। ” अर्थात् ‘सहजानन्द’ की स्थिति।
+ रामविषयक ग्रन्थों में यह विवरण है कि शिवधनुष ‘पिनाक’ सीता के संकेत पर हलका-भारी हो जाया करता था और वे उसे हटाकर उस स्थान की स्वच्छता करती थीं और पुन: उसे वहीं रख देती थीं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ अगस्त, २०२० ईसवी)