“ठाकुर श्रीनाथ सिंह कुसुम कुमारी, जय देवी तो खरमस्त भी बन जाया करते थे” – आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रयागराज। हिन्दी-बालसाहित्य-रचना और बाल-पत्रकारिता का इतिहास-लेखन करते समय इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की प्रसिद्ध विभूति के रूप मे ठाकुर श्रीनाथ सिंह प्रथम पंक्ति मे दिखेँगे।
इलाहाबाद-स्थित जसरा के मानपुर गाँव के एक किसान-परिवार मे १ अक्तूबर, १९०१ ई० को जन्म लेनेवाले श्रीनाथ को उनके पिता कामता सिंह ने उन्हेँ अध्ययन करने के लिए शहर भेजा था। उन दिनो महात्मा गांधी के असहयोग-आन्दोलन का वातावरण था, जिससे श्रीनाथ सिंह भी प्रभावित थे। उन्हेँ कारावास का दण्ड भी भुगतना पड़ा। उनका गांधी जी के साथ सीधा संवाद होता था।

ऐसे क्रान्तिकारी व्यक्तित्व के स्वामी के जन्मदिनांक १ अक्तूबर के अवसर पर ‘सारस्वत सदन’, आलोपीबाग़, प्रयागराज से एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे देश के अनेक राज्योँ से प्रबुद्धजन की सहभागिता रही।

रायपुर (छत्तीसगढ़) से डा० रजनीश गौतम ने बताया– जब मै हिन्दी बाल-साहित्य पर शोध कर रहा था तब ठाकुर श्रीनाथ सिंह के रचनाकर्म से अवगत हुआ था। निस्संदेह, वे जो भी विषय लेते थे, डूबकर रचना करते थे।

अमरावती (महाराष्ट्र) से प्रो० क्षितिजा अवस्थी ने कहा– आपके इलाहाबाद से प्रसिद्ध प्रकाशन-प्रतिष्ठान इण्डियन प्रेस से साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ का प्रकाशन होता था, जिसके सम्पादन मे श्रीनाथ जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। वहीँ से उनके सम्पादन मे प्रकाशित बालपत्रिका ‘बालसखा’ का कोई जवाब नहीँ था।

आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– ठाकुर श्रीनाथ जी एक साहित्यकार और सम्पादक ही नहीँ थे, एक महान् क्रान्तिदर्शी भी थे। वे अपनी राजनीतिक चेतना के कारण ही इलाहाबाद से प्रकाशित पं० मोतीलाल नेहरू के समाचारपत्र ‘देशबन्धु’ से जुड़े। वे समाचारपत्र-उद्योग जाँच-समिति के सदस्य भी थे। उन्होँने क्रान्तिकारी बिस्मिल के गीत ‘हिन्दोस्ताँ हमारा’ का प्रकाशन किया था; लेकिन उसका मुद्रणकार्य अँगरेज़ी प्रशासन के दबाव मे समाप्त करना पड़ा था। आगे चलकर, वे ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ से सम्बद्ध हुए। जब वे ‘सरस्वती’ पत्रिका से जुड़े थे तब उसमे हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ के दस छन्द प्रकाशित हुए थे। कटरा मे आज जहाँ मिश्रा फार्मेसी है, उसी के समीप उन्होँने बालपत्रिकाएँ ‘दीदी’ और ‘बालबोध’ तथा किसानो की पत्रिका ‘हल’ का सम्पादन किया था। ‘देशदूत’ के सम्पादन मे उनकी विशिष्ट भूमिका थी। आचार्य ने आगे बताया– श्रीनाथ सिंह जी ने झाँसी की रानी, सोमनाथ, क्षमा, अपहर्ता, नयनतारा, राधारानी, प्रेमपरीक्षा, अपराधिता, एकाकिनी, कवि और क्रान्तिकारी, प्रजामण्डल, उलझन, जागरण इत्यादिक उपन्यासोँ तथा पृथ्वी की कहानी, परीदेश, दोनों भाई, दो कुबड़े इत्यादिक बाल-साहित्य की रचना की थी।

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने यह भी बताया– जब मै मम्फोर्डगंज, प्रयागराज-स्थित उनके घर मे मिला था तब उन्होँने अपना लेखकीय उद्घाटन करते हुए बताया था कि उन दिनो लेखकोँ और साहित्यकारोँ का अभाव था, इसलिए उन्हेँ लक्ष्मीकान्त वर्मा, विनोद शर्मा, अरुण प्रकाश विशारद, जयदेवी, कुसुम कुमारी, देवीकली, लालसखा, खरमस्त, श्रीपत इत्यादिक नामो से लिखकर काम चलाना पड़ता था।