लालबहादुर शास्त्री अपने जीवन मे बैंक से लिया गया ऋण भी न चुका पाये थे

प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’ की ओर से २ अक्तूबर को ‘सारस्वत सदन’, आलोपीबाग़, प्रयागराज से देश के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री की आन्तर्जालिक जयन्ती मनायी गयी, जिसमे एक महान् आत्मा– ”जय जवान-जय किसान” का अनन्य उद्घोष करनेवाले भारतरत्न लालबहादुर शास्त्री जी की सादगी और राष्ट्र के प्रति उनकी सात्त्विक अवधारणा को नमन किया गया।

कानपुर से समीक्षक डॉ० बद्री प्रसाद ने कहा– आज देश की दुरवस्था को देखकर शास्त्री जी का ध्यान बरबस ही आने लगा है। यदि वो आज होते तो अपने उद्घोष “जय जवान-जय किसान” को मरने नहीँ देते।

भोपाल से प्रो० रचना शाकल्ले ने कहा– ”सादा जीवन-उच्च विचार” यदि देखने होँ तो शास्त्री जी मे देखेँ। उन्होँने कभी शासकीय वाहन का प्रयोग अपने घर-परिवार के लिए नहीँ किया था। उनके बच्चे भी विद्यालय ताँगे से जाते थे। उनके आकस्मिक निधन के बाद बैंक से लिया गया ऋण बकाया था, जिसे उनकी धर्मपत्नी ललिता देवी ने अपनी पेंशन से चुकाया था।

आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– सादगी की प्रतिमूर्ति भारतरत्न लालबहादुर शास्त्री जी ने भारत के द्वितीय प्रधानमन्त्री बनाये जाने के अनन्तर लाल क़िले के (‘की प्राचीर’ अशुद्ध है।) प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए कहा था, ”हम रहेँ या न रहेँ; लेकिन यह तिरंगा रहना चाहिए। हम और आप रहेँ या न रहेँ; लेकिन भारत का सिर ऊँचा रहना चाहिए।”