अपनी ‘जन्मतिथि’ के अवसर पर स्वयंं को समर्पित पंक्तियाँ

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आज कैलेण्डर में टँकी तिथि
एक जुलाई,
आँखों-में-आँखें डाल
तीन सौ पैंसठ दिनों की दैनन्दिनी उघारे,
सिद्धहस्त ज्योतिषी-सदृश अतीत-वाचन कर रही है।
आषाढ़-मास के उमड़ते-घुमड़ते बादल देख,
कवि-कलाधर, कवि-कुसुमाकर, कवि-चूड़ामणि
कवि-सम्राट कालिदास का
‘मेघदूत’ जीवन्त हो उठता है।
पावस-ऋतु का आगमन
और सम्प्रति, वर्षा का गमनागमन,
प्रश्न-प्रतिप्रश्न के गह्वर में धकेल आते हैं।
अन्तहीन-सी बूँदें ग्रीष्म-तपन से
‘पृथ्वी’ को आश्वस्त कर रही हैं
अथवा ‘पृथ्वी’ की आयु से एक वर्ष का अभाव,
अश्रुपूरित संवेदना का विस्तार कर रहा है।
शुभ-कामना के अम्बार से दबा मैं
किंकर्त्तव्यविमूढ़-सा,
क़दमों के घटते-बढ़ते पगचिह्नों से प्रश्न करता हूँ
तो कभी पग-चाप के आरोह-अवरोह को,
कर्णरन्ध्रों के समीप ले आता हूँ।
अनुभव का वितान तानता हूँ तो
स्वयं को वय-वार्द्धक्य के साथ,
एक सोपान नीचे ढुलका हुआ पाता हूँ।
एक वर्ष की उपलब्धियाँ—
मुँह चिढ़ाती नज़र आती हैं।
मैं उन अनथक पाँवों की रेखाओं
और न फूटे हुए छालों से प्रश्न करता हूँ।
सब-के-सब आँखें मोड़ लेते हैं
और मुझे छोड़ आते हैं,
देह-अवसान के समीप
एक क़दम और आने के लिए।
एक और ‘एक जुलाई’
की प्रतीक्षा सहने के लिए।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ जुलाई, २०२० ईसवी)