डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
वैश्विक राजनीति में शक्ति का अर्थ तेजी से बदल रहा है। एक समय दुनिया की दिशा तय करने के लिए अमेरिका, चीन, रूस और यूरोप जैसी बड़ी शक्तियों की ओर देखा जाता था, लेकिन अब भारत, ब्राजील, इंडोनेशिया, सऊदी अरब, तुर्किये, दक्षिण अफ्रीका और वियतनाम जैसी उभरती तथा मध्यम शक्तियां भी वैश्विक एजेंडा तय करने में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा रही हैं।
नई दिल्ली में आयोजित म्यूनिख लीडर्स मीटिंग 2026 के उद्घाटन सत्र में विदेश मंत्री डॉ० एस० जयशंकर ने इसी बदलती शक्ति-संरचना को रेखांकित करते हुए उभरती और मध्यम शक्तियों के बीच सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई। उनका जोर कूटनीति, व्यापार, तकनीक, स्वास्थ्य, रक्षा, संपर्क, जलवायु, उन्नत विनिर्माण और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में साझा क्षमता विकसित करने पर रहा। यह बयान केवल कूटनीतिक टिप्पणी नहीं है। इसके पीछे वैश्विक अर्थव्यवस्था के बदलते आंकड़े भी हैं।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के जुलाई 2026 के अनुमान के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था 2026 में 6.4 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। इसके मुकाबले चीन की वृद्धि दर 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। वियतनाम के लिए 7.5 प्रतिशत और इंडोनेशिया जैसे एशियाई देशों के लिए भी अपेक्षाकृत मजबूत वृद्धि का अनुमान वैश्विक आर्थिक गतिविधि के केंद्र में एशिया की बढ़ती भूमिका को दिखाता है।
देश या क्षेत्रानुसार 2026 मे अनुमानित वास्तविक जीडीपी वृद्धि इस प्रकार है– भारत 6.4 फीसदी, चीन 4.6 फीसदी, वियतनाम 7.5 फीसदी, ब्राजील 2.4 फीसदी, रूस 1.1 फीसदी, दक्षिण अफ्रीका 1.1 फीसदी और विश्व अर्थव्यवस्था 2.9 फीसदी दर्ज की गयी।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि ‘मध्यम शक्ति’ होना जरूरी नहीं कि आर्थिक रूप से कमजोर होना हो। कई मध्यम शक्तियां तेजी से बढ़ रही हैं और वैश्विक उत्पादन, निवेश तथा बाजारों में अपना हिस्सा बढ़ा रही हैं।
विश्व व्यापार संगठन के अनुसार 2025 में वस्तुओं और वाणिज्यिक सेवाओं का वैश्विक व्यापार बढ़कर लगभग 34.89 ट्रिलियन डॉलर हो गया, जो एक वर्ष पहले की तुलना में 8 प्रतिशत अधिक था। वैश्विक व्यापार में सेवाओं की हिस्सेदारी भी 27.5 प्रतिशत तक पहुंच गई। लेकिन 2026 में तस्वीर कुछ अलग है। विश्व व्यापार संगठन ने 2026 में वैश्विक वस्तु व्यापार की वृद्धि दर केवल 1.9 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। इसका कारण टैरिफ, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों और व्यापारिक अनिश्चितता को माना गया है। यहीं से मध्यम शक्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। जब बड़ी शक्तियों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ता है, तब कंपनियां वैकल्पिक उत्पादन केंद्र और सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाएं तलाशती हैं।
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था को समझने के लिए यह अंतर करना जरूरी है कि दुनिया चीन से ‘डिकपल’ हो रही है या केवल अपनी निर्भरता कम कर रही है। विश्व व्यापार संगठन के अनुसार वैश्विक वैल्यू चेन अभी भी बेहद मजबूत हैं और विश्व व्यापार का लगभग 46.3 प्रतिशत हिस्सा वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से जुड़ा है। हालांकि, इन शृंखलाओं में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी बढ़ रही है।
भारत, वियतनाम, थाईलैंड और अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं ने चीन-केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन से लाभ उठाया है। इसका मतलब ‘चीन प्लस वन’ जैसी रणनीतियां भारत के लिए अवसर पैदा करती हैं। लेकिन भारत के सामने चुनौती यह है कि केवल बड़ी आबादी या बड़ा बाजार पर्याप्त नहीं है। वैश्विक कंपनियां बिजली, लॉजिस्टिक्स, कुशल श्रम, बंदरगाह, कर व्यवस्था और नियामकीय स्थिरता भी देखती हैं।
भारत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह एक साथ कई आर्थिक और रणनीतिक नेटवर्क से जुड़ सकता है। भारत-अमेरिका और यूरोप के साथ तकनीक तथा निवेश संबंध बढ़ाता है, रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध बनाए रखता है और साथ ही ग्लोबल साउथ के देशों के साथ राजनीतिक सहयोग को मजबूत करता है।
भारत के आयात आंकड़े भी उसकी विविध लेकिन जटिल निर्भरता को दिखाते हैं। विश्व व्यापार संगठन के अनुसार 2024 में भारत के कुल आयात करीब 721.2 अरब डॉलर थे। इनमें चीन की हिस्सेदारी 15.7 प्रतिशत, रूस की 8.8 प्रतिशत, संयुक्त अरब अमीरात की 8.8 प्रतिशत, यूरोपीय संघ की 8.4 प्रतिशत और अमेरिका की 6.3 प्रतिशत थी।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—भारत किसी एक आर्थिक साझेदार पर पूरी तरह निर्भर नहीं है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में उसकी निर्भरता कई देशों में फैली हुई है। यही विविधता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने में मदद कर सकती है।
विदेश मंत्री जयशंकर के संदेश का मूल अर्थ यही है कि भविष्य की वैश्विक राजनीति में साझेदारी स्थायी गठबंधनों से अधिक हित आधारित और मुद्दा आधारित हो सकती है। तकनीक में भारत अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ सहयोग कर सकता है। ऊर्जा में रूस और पश्चिम एशिया के देशों के साथ संबंध महत्वपूर्ण रह सकते हैं। विनिर्माण में भारत वियतनाम, जापान, दक्षिण कोरिया और पश्चिमी कंपनियों के साथ सहयोग बढ़ा सकता है। जलवायु और विकास के मुद्दों पर भारत ग्लोबल साउथ के देशों के साथ साझा मंच बना सकता है। समुद्री सुरक्षा में भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ सहयोग कर सकता है। याद रहे कि इस मॉडल में किसी देश को हर मुद्दे पर एक ही साझेदार चुनने की आवश्यकता नहीं रहती।
नयी वैश्विक प्रतिस्पर्धा केवल तेल, गैस और सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है। अब सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा सेंटर, महत्वपूर्ण खनिज और डिजिटल तकनीक भी राष्ट्रीय शक्ति के आधार बन रहे हैं।
विश्व व्यापार संगठन के आंकड़े बताते हैं कि 2025 में एआई से जुड़े सामान का वैश्विक व्यापार 4.18 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया और इन उत्पादों ने वैश्विक व्यापार वृद्धि में करीब *म42 प्रतिशत योगदान दिया। यह आंकड़ा बताता है कि तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं पर नियंत्रण आने वाले वर्षों में विदेश नीति का प्रमुख हिस्सा क्यों बनने वाला है।
भारत के लिए यह बड़ा अवसर है, लेकिन साथ ही चुनौती भी। यदि भारत को केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं बल्कि वैश्विक तकनीकी शक्ति बनना है तो उसे चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर निर्माण, एआई, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और उच्च तकनीक विनिर्माण में अपनी क्षमता बढ़ानी होगी। यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मध्यम शक्तियां अकेले अमेरिका या चीन की बराबरी नहीं कर सकतीं। लेकिन कई मध्यम शक्तियां यदि किसी एक मुद्दे पर मिलकर काम करें तो उनका सामूहिक प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है।
उदाहरण के लिए, ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, खाद्य सुरक्षा, डिजिटल भुगतान, समुद्री सुरक्षा और जलवायु वित्त जैसे विषयों पर कई देशों के साझा हित हैं। इसलिए भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल ‘कौन सबसे बड़ी शक्ति है’ का सवाल नहीं होगी। सवाल यह भी होगा कि कौन कितने देशों को किसी मुद्दे पर अपने साथ खड़ा कर सकता है। यहीं भारत की कूटनीतिक क्षमता का महत्व बढ़ता है।
चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की वैश्विक कोशिश भारत के लिए अवसर है। इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, रक्षा उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भारत अपनी क्षमता बढ़ा सकता है। भारत विकासशील देशों की समस्याओं— कर्ज, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, जलवायु वित्त और तकनीकी पहुंच को वैश्विक मंचों पर अधिक प्रभावी ढंग से उठा सकता है। भारत पश्चिम और ग्लोबल साउथ, विकसित अर्थव्यवस्थाओं और उभरते बाजारों तथा अलग-अलग रणनीतिक समूहों के बीच संवाद का पुल बन सकता है।
भारत और अन्य मध्यम शक्तियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वैश्विक ध्रुवीकरण बहुत ज्यादा बढ़ गया तो ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ बनाए रखना कठिन हो सकता है। दूसरा जोखिम आर्थिक है। यदि व्यापारिक युद्ध और टैरिफ लंबे समय तक चलते हैं तो निर्यात आधारित विकास प्रभावित हो सकता है। तीसरा जोखिम तकनीकी है। एआई और सेमीकंडक्टर जैसी तकनीकों में कुछ गिने-चुने देशों का वर्चस्व नई प्रकार की निर्भरता पैदा कर सकता है। चौथा जोखिम ऊर्जा सुरक्षा का है। पश्चिम एशिया में संघर्ष या तेल कीमतों में तेज वृद्धि भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव डाल सकती है। विश्व व्यापार संगठन ने भी 2026 के वैश्विक व्यापार पर ऊर्जा कीमतों और पश्चिम एशिया के संघर्ष के जोखिम को रेखांकित किया है।
म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में जयशंकर का संदेश ऐसे समय आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों संक्रमण के दौर में हैं। दुनिया न तो पूरी तरह पुरानी एकध्रुवीय व्यवस्था में लौट रही है और न ही कोई नया स्थिर द्विध्रुवीय ढांचा बन पाया है। इसके बजाय एक बहुध्रुवीय और नेटवर्क आधारित व्यवस्था उभरती दिखाई दे रही है। भारत की 6.4 प्रतिशत अनुमानित आर्थिक वृद्धि, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में उसकी बढ़ती भूमिका और विभिन्न शक्ति-केंद्रों के साथ समानांतर संबंध उसे इस व्यवस्था में विशेष स्थान देते हैं।
आने वाले दशक में भारत की असली परीक्षा यह नहीं होगी कि वह अमेरिका या चीन की बराबरी कब करता है। असली परीक्षा यह होगी कि वह कितने देशों को अपने साथ जोड़कर वैश्विक नियमों, व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और सुरक्षा के एजेंडे को प्रभावित कर सकता है।
यही बदलाव ‘मध्यम शक्ति’ की पारंपरिक परिभाषा को बदल रहा है। आज प्रभाव केवल सैन्य ताकत या जीडीपी के आकार से तय नहीं होता। बाजार, तकनीक, आपूर्ति शृंखला, कूटनीति और साझेदारियों का नेटवर्क; इन सबको एक साथ इस्तेमाल करने की क्षमता ही आने वाली वैश्विक शक्ति का नया पैमाना बन सकती है और इस बदलती दुनिया में भारत के पास केवल प्रतिक्रिया देने का विकल्प नहीं है; उसके सामने वैश्विक एजेंडा बनाने का अवसर भी है।