कोरोना वायरस आपदा : ताकि विश्वास की लौ जलती रहे!

डॉ. नरेन्द्र शुक्ल नेहरू (शोध प्रमुख – मेमोरियल म्यूज़ियम एण्ड लाइब्रेरी, नई दिल्ली)

Dr. Narendra Shukla

हम अपने घरों में खुद को छुपाये बैठे हैं। लाखों सेल्फ आइसोलेशन में हैं,और हजारों क़वारेन्टीन में हैं। पूरी दुनिया जब एक विषाणु से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है तब केवल एक ही नियम बचा है कि आप अपनी जान बचा लीजिये तो ये सारी दुनिया बच जाएगी। तो इस तरह एकाएक अकेले हो गए हैं हम। क्या यह लड़ाई हम सब की अकेले की लड़ाई है? दुनियाभर में जो विषाणु लाखों की जान ले चुका है उससे अकेले लड़ने की रणनीति क्या हो सकती है?

समूह क्या है? कम से कम भीड़ तो नहीं है, क्योंकि भीड़ में अकेलापन तो हमारी अपनी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। समूह वह है जिसमे व्यक्ति अपने अकेलेपन का कुछ हिस्सा समूह की सार्वजनीन चेतना में विसर्जित कर देता है। व्यक्तित्व का जितना हिस्सा इस सार्वजनीन चेतना में विसर्जित होता जाता है उतना ही समूह मजबूत होता जाता है, धीरे धीरे सार्वजनीन चेतना व्यक्तित्व का हिस्सा हो जाती है। जब व्यक्तित्व और सार्वजनीन चेतना में प्रवाह स्थिर हो जाते हैं तब वह कोई पंथ का रूप ले लेता है, किंतु यदि किसी समूह में व्यक्तित्व को खुले तौर पर विकसित होते रहने की संभावना बनी रहती है तो उसकी सार्वजनीन चेतना भी लगातार उर्जित और गतिमान बनी रहती है। इस तरह संस्कार, संस्कृति से होते हुए एक धर्म बन जाता है।

यह एक जैविक युद्ध है। मानव या विषाणु जो भी खुद में तेजी से बदलाव करेगा और समूह उस बदलाव को स्वीकार कर सार्वजनीन चेतना में स्थान देता रहेगा वो यह युद्ध जीत जाएगा।

इसके लिए आवश्यक है कि हम समय समय पर अपनी अकेली लड़ाई को सामूहिक करते रहें। और समूह से प्राप्त ऊर्जा से अपनी आत्मा की लौ प्रकाशित करते रहें।

5 अप्रैल को हम सभी दीपक जलाएं और चारों तरफ जलते दिए की रोशनी को महसूस करें। विश्वास करिए ये लड़ाई अकेले नहीं लड़ रहे हैं हम।