डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
केन्द्र और राज्य की सरकारें स्वस्थ तन-मन से युक्त कुछ जाति-विशेष को ‘दलित’ कहकर अपमानित करती आ रही हैं और अफ़सोस! वे जातियाँ फूले नहीं समा रही हैं। इस ‘दलित’ शब्द को कुछ जातियों के मस्तक पर इस तरह से टाँक दिया गया है कि वे जातियाँ ‘दलित’ मानसिकता से ग्रस्त बनी रहती हैं।
यह भी दु:ख की बात है कि आज़ादी के बाद से आज तक ‘सत्ता की राजनीति’ करते हुए, ‘हरिजन से दलित’ तक की जो परिक्रमा हमारे राजनेता करते आ रहे हैं, उससे भारतीय समाज को अत्यन्त क्षति पहुँची है; सामाजिक समरसता, सदाशयता, सौमनस्य, तथा सौजन्य का सन्तुलन अपनी मूल धुरी से खिसक चुका है। इसका एकमात्र कारण ‘वोट की राजनीति’ है; और इसी कुचक्र में तरह-तरह के सब्ज़बाग़ दिखाते हुए, तथाकथित दलित-समुदाय को बुरी तरह से आक्रान्त कर लिया गया है।
प्रश्न है, आज तक सरकारों ने दलितों के लिए क्या किया है? नितान्त शोचनीय जीवन जीनेवाले कितने दलितों के गाँवों/परिवारों को ‘गोद’ लिया गया है? स्वार्थ की पूर्ति के लिए एकमात्र ‘आरक्षण’ का झुनझुना थमा दिया गया है, जिसे वही बजा पाते हैं, जो शैक्षिक दृष्टि से अपनी ही जातियों में बेहतर दिखते हैं।
आँकड़े बोलते हैं कि ४५% दलित-परिवारों के पास ज़मीन नहीं है। ऐसे में, देश की सरकार दलितों का उद्धार कर रही है अथवा संहार कर रही है?
सरकार आरक्षण की नौटंकी बन्द कर, सबसे पहले उन दलितों का सामाजिक स्तर उन्नत करे, जो सुपात्र हैं। इसके लिए उनके लिए ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ और समुचित ‘शिक्षा-दीक्षा’ की, बिना किसी आरक्षण के, व्यवस्था करनी होगी।
तत्काल प्रभाव से ‘दलित’ शब्द के स्थान पर ‘सर्वहारा-वर्ग’ का प्रयोग करना होगा, जो किसी भी जाति-वर्ग, सम्प्रदाय आदिक के हो सकते हैं। जिनको दलित कहकर देश के राजनेता अपमानित करते आ रहे हैं, उन्हें स्वाभिमान तलाशना होगा। ‘दलित’ बहुत ही घृणित शब्द है, जो प्रत्यक्षत: शेष समाज को अस्पृश्यता का भान कराता है और ऐसा देश का एक-एक राजनेता चाहता है।
लज्जा का विषय है कि देश के वर्तमान राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को ‘दलित-जाति’ के नाम पर चुनाव लड़ाया गया था और दोनों ने स्वीकार भी कर लिया था; परन्तु भारत देश के वास्तविक प्रबुद्धजन इसे कदापि स्वीकार नहीं करते। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति किसी जाति का नहीं होता; प्रत्युत वह समग्र राष्ट्र का होता है।
अस्तु, इस विषय पर गम्भीरतापूर्वक विचार कर ‘सर्वसमभाव’ की स्थिति उत्पन्न करनी होगी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३ मई, २०१८ ई०)