कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

तुम्हि असल्यावरति अम्हाँ काय हो उणें अर्थात तुम मिले तो और किस की इच्छा मुझे है

डॉ॰ निर्मल पाण्डेय (लेखक/इतिहासकार)

डॉ• निर्मल पाण्डेय

महाप्रयाण से महीने भर पूर्व 11 मई 1940 को हुयी एक बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार ने समाज में कार्यकर्ताओं को किस प्रकार बर्ताव करना चाहिए इस पर उन्होंने कहा:

‘‘लोगों के साथ आत्यन्तिक प्रेम का व्यवहार करो। कांग्रेस, सोशलिस्ट, हिन्दू सभा आदि संस्थाओं के लोग अपने ही हैं। हम उनके साथ निष्कपट भाव से बर्ताव करें। किसी से झूठा व्यवहार मत करो और न किसी को फँसाओ। कांग्रेस का कोई भी व्यक्ति मेरे प्रति तनिक भी द्वेष नहीं रख सकता। द्वेष का कारण ही क्या है? यदि दल भिन्न रहे तो भी मित्र के नाते दिल खोलकर एक स्थान पर आने में आपत्ति क्या है? हमें केवल अपने विचार के लोगों में ही काम नहीं करना है अपितु विरोधियों को भी अपना बनाना है। इसके लिए संघ के सम्बन्ध में उनकी भावना शुद्ध होनी चाहिए। हमारा ध्वज एवं हमारी विचारधारा यदि उन्हें मान्य न हो तो भी हमें उनसे द्वेष करने की आवश्यकता नहीं। हम उन्हें विरोध का अवसर न दें।….

…यदि हम चाहते हैं कि सब काम व्यवस्थित रूप से हों तो प्रेम के साथ चलें। प्रेम के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही नहीं है। प्रेम एवं आदर बढ़ाते-बढ़ाते ही अपनी शक्ति बढ़ती रहनी चाहिए।’’

इसी सभा में शामिल स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने कुछ देर पहले अपनी बात रखते हुए यह स्पष्ट किया था कि, ‘‘……..आज हिन्दू राष्ट्र की स्थिति बहुत बिगड़ गयी है। इस अवस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही एकमेव आशा की किरण है। आज जो संघ कर रहा है वही महान् राष्ट्रों को करना पड़ा था। ………..निर्बलता से सबलता की ओर बढ़ने का मार्ग संगठन ही है। अतः आप अपने नेता पर पूर्ण विश्वास रखिए। हमने अपने जीवन-भर देश के लिए अनेक आन्दोलन किये पर एक भी पूरी तरह सफल नहीं हुआ। इसलिए पुनः एक बार मैं बल देकर कहता हूँ कि यह संगठन ही हिन्दू राष्ट्र का उद्धार कर सकेगा।’’

उपरोक्त बातों को नाना पालघर ने ‘डॉ. हेडगेवार की जीवनी’ में विस्तार से उठाया है, वो लिखते हैं कि इस घटना के कुछ दिन बाद ही, यानी 20 मई 1940 को डॉ. हेडगेवार से मिलने आए डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने बंगाल में व्याप्त अराजकता बयां करते हुए कहा, “अब बंगाल में कोई ‘हिन्दू रक्षा दल’ बनाये बिना हिन्दुओं के लिए कोई बचाव का रास्ता नहीं बचा।’’

डॉ. हेडगेवार ने शंका जाहिर की, ‘‘आप ‘हिन्दू रक्षा दल’ बनाने की सोच रहे हैं, परन्तु क्या अंग्रेज और लीगी मुसलमान अपनी आँखों-देखते उनके अस्तित्व को चुनौती देनेवाले इस दल को चलने देंगे?’’ यह सुनकर डॉ. मुखर्जी सोच में पड़ गये और बोले ‘‘फिर इसमें से हिन्दुओं के लिए ठीक रास्ता फिर क्या है?’’

डॉ. हेडगेवार ने शांत पर गंभीर और दृढ़ होकर कहा, ‘‘बंगाल या पंजाब में उत्पन्न हुई तथा स्थान-स्थान पर बीच-बीच में हिन्दुओं की दृष्टि से पैदा होनेवाली विकट परिस्थिति का मूल कारण अपने समाज की विसंघटित अवस्था है। इस स्थिति को स्थायी रूप से दूर किये बिना कहीं-न-कहीं हिन्दुओं के विरुद्ध इस प्रकार के उपद्रव होते ही रहेंगे। इन पर क्षणिक प्रतिक्रियात्मक एवं आंशिक उपाय-योजना करने से वर्तमान परिस्थिति को स्थायी रूप से नहीं बदला जा सकता।

इसके लिए तो देश-भर में हिन्दुओं के मन में समष्टिभाव निर्माण करना एवं एक राष्ट्रीयत्व के संस्कार से हिन्दुओं के मनों को प्रभावी बनाना आवश्यक है। हिन्दुओं में परस्पर प्रेम तथा राष्ट्र की दृष्टि से वैभव के शिखर पर आरूढ़ होने की महत्त्वाकांक्षा उत्पन्न करना ही राष्ट्रोत्थान का विधायी एवं स्थायी मार्ग है तथा संघ उसी का अनुसरण कर रहा है।’’

आज से अस्सी वर्ष पूर्व ज्येष्ठ बदी द्वितीया 1862 शक संवत, दिनांक 21 जून 1940 प्कोाः नौ बजकर सत्ताईस मिनट पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक परम पूजनीय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार महाप्रयाण पर निकल पड़े, और पीछे छोड़ गए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रुपी एक राष्ट्रीय चेतना से लैस एक संगठन को जो आज भी नित नए प्रयासों से भारतवर्ष को परम वैभव तक ले जाने को कृत-संकल्पित है।