राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट की, जिस पर विचार-विमर्श भी किया गया । आप भी इस विचार-विनिमय में प्रतिभाग कर सकते हैं । प्रस्तुत है विमर्श की संक्षिप्त बातें…
राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ कि पोस्ट के अनुसार “पत्रकारिता का तेज़ाबी अन्दाज़ काफ़ूर है । शोले उगलने वाली क़लम ख़ामोश है । #अर्णबगोस्वामी आप की गिरफ़्तारी बता रही है कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सरकारी कोठों पर गिरवी है ।”
युवा कवि अभिजीत मिश्र का कहना है कि विपक्षी को अर्नब का कसूर नजर आता है लेकिन उद्धव का कसूर देखने के समय यही लोग नेत्रहीन हो जाते हैं। समाज, सभ्यता और संस्कृति से लेकर संसद तक उठने वाले अर्नब के हर नाद को दबाने की कोशिश कर चुके हैं उद्धव ठाकरे! कल को यदि अर्नब का एनकाउंटर करने का ये लोग मन बनायेंगे तो इस कार्य में सफल भी हो जायेंगे। पत्रकारितारूपी, लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को सरकार पुरस्कृत करने में शक्तिहीन हो जाती है, और कारावास देने में सर्वोपरि, वह भी तब जब इसे लोकतंत्र के एक अपरिहार्य अंग का दर्जा प्राप्त है। वरिष्ठ पत्रकारों व विचारकों को अर्नब का पूर्ण समर्थन करना चाहिए।
अध्यापक व विचारक गोपाल सिंह का कहना है कि त्रिपाठी जी जरा समग्रता में सोचिए, खुद से सवाल कीजिए तो आपका, ‘स्व’ खुद जवाब देगा कि अर्णव जो कर रहे थे, क्या वो पत्रकारिता थी ? इसके अलावा और बहुत प्रश्न है इस संदर्भ मे इस पर स्वथ्य बहस हो सकती है ।
अध्यापक व विचारक गोपाल सिंह के तर्क के उत्तर में राघवेन्द्र का कहना है कि यह तो मैं पहले भी कहता रहा हूँ कि अर्नब जैसे पत्रकार सरकारी कोठों की रखैल बन गये हैं । लेकिन जिस तरह और जिन मुद्दों को लेकर यह गिरफ़्तारी हुई है, निन्दनीय है । पत्रकारिता की जगह चाटुकारिता करने वाले लोग की सङ्ख्या सैकड़ों में है, तो अर्नब ही क्यों ? कारण आप भी जानते हैं ! कथित लिबरल और वामी एजेण्डा इन सबके पीछे काम कर रहा है । यदि इस पर ध्यान न दिया गया तो यह नितान्त घातक सिद्ध होगा ।
युवा लेखक व चिन्तक राम वशिष्ठ का मत है कि पहले मुझे भी लगता था कि अर्नब गोस्वामी जो करते है वो पत्रकारिता नही है लेकिन गंभीरता से सोचना प्रारम्भ किया तो लगा कि पत्रकारिता तो कर रहे है लेकिन पत्रकारिता का अंदाज़ अलग है और आपत्तिजनक भी है । फिर कुछ समय बाद अर्नब की पत्रकारिता के अंदाज़ से अलग देश और हिन्दुत्व पर भी सोचा तो समझ आया जो अर्नब गोस्वामी कर रहे है वो करना बेहद जरूरी है । हम अभी इसको इसलिए हजम नही कर पाते क्योंकि हम पत्रकारिता की किताबी परिभाषाओं को जानते है और उन पैमानों पर अर्नब की पत्रकारिता आपत्तिजनक हो जाती है । मेरा पूरा सपोर्ट है अर्नब गोस्वामी को ।
राघव : हिन्दुत्व का पक्ष लेना ही अर्नब के विरोध की मुख्य वज़ह है । इस पर अर्नब का साथ देने की ज़रूरत है ।