संयोजक-सूत्रधार : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
निस्सन्देह, यह गम्भीर विषय है; जिसका सामाजिक महत्त्व कम, परन्तु ‘राजनीतिक’ बहुत अधिक है। इसी ‘दलित’ शब्द को देश के राजनेताओं और मीडियाकर्मियों ने भारतीय समाज में इस रूप में व्याप्त कर दिया है कि इस शब्द-प्रयोग के प्रति अरुचि होने लगी है। ‘दलित’ शब्द इतना घातक है और प्रभावकारी भी कि समाज की अति निम्न कोटि की कतिपय जातियाँ इसे अपने को लाभ और समाज को हानि पहुँचाने के लिए ‘ब्रहमास्त्र’ के रूप में करती आ रही हैं। ऐसी जातियों का राजनीतिक असर इस हद तक है कि वे ‘दलित एक्ट’ बनवाने में सफल हो गयीं।
अब आप विचार कीजिए, किसी भी देश का संविधान जाति पर आधारित क़ानून बनाने की इजाज़त देता है क्या? यदि हाँ तो शेष जातियों के लिए क़ानून क्यों नहीं?
ऐसे में, कतिपय महत्त्वपूर्ण प्रश्न आ खड़े होते है :— दलित शब्द को ‘व्यक्तिवाची’ के रूप में क्यों प्रस्तुत किया जाता है? क्या ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों में ‘दलित’ लोग नहीं हैं? ऐसे में, इस ‘दलित’ शब्द के स्थान पर क्यों न ‘सर्वहारा’ शब्द का प्रयोग हो, जिसके अन्तर्गत भारतीय समाज के सर्वाधिक सताये हुए लोग आते हैं?
परिसंवाद
संदीप कुमार पांडेय- महज शब्दों का हेर-फेर कोई सार्थक बदलाव नहीं ला सकता है ।
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- आपका सोचना सत्य है परन्तु यहाँ शब्द-प्रयोग के औचित्य पर प्रश्न किया गया है।
पुरुषोत्तम फौजदार- सामाजिक स्तर पर बदलाव हो नाम की जगह उसकी सूरत बदलनी चाहिए “हरिजन”से दलित” से सर्वहारा सादर नमन ।
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ‘हरिजन’ और ‘दलित’ शब्द से अति निम्न कोटि की ही जातियों का बोध होता है, जबकि ‘सर्वहारा’ शब्द से समाज की सर्वाधिक दुर्बल और निर्बल जातियाँ रेखांकित होती हैं।
संदीप कुमार पांडेय- किसी चीज के होने-करने से होने वाला नफा-नुकसान ही औचित्य की कसौटी होती है ।
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- उपर्युक्त प्रश्न के परिप्रेक्ष्य में इसे सुस्पष्ट कीजिए।
संदीप कुमार पांडेय- जिस प्रकार विकलांग को दिव्यांग कहने से उसकी दशा पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, उसी प्रकार इस शब्द परिवर्तन से उनके हालात में कोई तब्दीली नहीं आने वाली । जब ऐसा करने से कोई फायदा ही नहीं है तो फिर ऐसा करने का कोई तार्किक औचित्य नहीं बनता ।
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- आप विषय से भागते हुए दूसरे रास्ते पर अपना वैचारिक रथ दौड़ा रहे हैं। अब मैंने और स्पष्ट कर दिया है, ताकि आपका वैचारिक वाहन दुर्घटनाग्रस्त न हो सके।
रामनारायण दुबे– संदीप जी तर्कसंगत विचार पर ध्यान दीजिए…आलोचनात्मक मत करो… दलित के सम्बन्ध मे सही विचार प्रस्तुत करने का प्रयास करो ।
अजीत शर्मा ‘आकाश’- साम्प्रदायिक शक्तियों ने माहौल इतना बिगाड़ दिया है कि साम्यवाद के इस अति महत्वपूर्ण एवं अत्यावश्यक “सर्वहारा” शब्द को अफ़ीम के नशे में धुत करा दी गयी जनता अभी समझ नहीं पायेगी…. मैं अपनी ग़ज़ल का एक शेर उद्धृत करने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ…. सो, हाज़िर करने के लिए विवश हूँ……
नशा अफ़ीम का हावी है जेह्न पर सबके,
लगेगा वक़्त अभी इन्क़िलाब आने में !!!
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- अत्युत्तम ।
रामनरेश मिश्र- उपयुक्त शब्द.. इसी तरह दिव्यांग शब्द का भी वैकल्पिक शब्द आविष्कृत करें ।
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ‘पराश्रित’ ।
रमेश मिश्र- उपयुक्त प्रतीत होता है ।
वीरेन्द्र तिवारी- सर्वहारा शब्द उचित है इस शब्द से सभी गरीबों का ख्याल मन मे उभरता है चाहे वह sc,st,obc, या फिर सामान्य वर्ग का गरीब हो क्योंकि दलित शब्द से केवल अनुसूचित जाति और जनजाति का ही बोध होता है । इसलिये यह शब्द वापस लिया जाना चाहिए ।
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- निस्सन्देह ।
विष्णु प्रकाश पाण्डेय- ये ‘दलित’ शब्द कब और किसने गढ़ा?
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- जिनकी दलित मनोवृत्ति रही है।
श्रीश राकेश जैन- विचारणीय है।
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- निस्सन्देह
कवि एस. बी. भारती- बेहतर और सही चिंतन ।
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- चिन्तन का विस्तार कीजिए।