——-०परिसंवाद-आयोजन०——-

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
सूत्रधार-संयोजक : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
विषय : देश की सरकार का जी०एस०टी० पर पलटी मारना, अनुभवहीनता का परिचायक है?
जिस तरह से आज (१० नवम्बर, २०१७ ई०) देश की सरकार ने १७७ वस्तुओं पर जी०एस०टी० को २८% से १८% पर लाने का निर्णय किया है, उसे देखते-समझते हुए इतना तो स्पष्ट हो गया है कि चार माह-पूर्व जिस रूप में जी०एस०टी० को लागू किया गया था, वह निस्सन्देह अपरिपक्व अनुभव की देन रही है। चार माह-पहले २२८ वस्तुओं पर २८% जी०एस०टी० लागू किया गया था। इस सम्बन्ध में केन्द्र-सरकार की नितान्त शिथिल आर्थिक नीति उजागर हो चुकी है।
उल्लेखनीय है कि १५ नवम्बर, २०१७ ई० से परिवर्त्तित जी०एस०टी० लागू होगा।
अब भी इस सरकार को चलानेवाले कह रहे हैं कि अब सिर्फ़ ५० लग्ज़री वस्तुओं पर २८% जी०एस०टी० लागू होगा, जिनमें सीमेण्ट और पेण्ट भी शामिल हैं। सरकार चलानेवाले बता सकते हैं : क्या सीमेण्ट और पेण्ट ‘लग्ज़री’ वस्तुएँ हैं?
‘एक राष्ट्र-एक कर’ के नाम पर जी०एस०टी० का जिस रूप में वर्गीकरण कर, जनसामान्य के साथ विश्वासघात किया गया है। इसे ‘संघटित लूट’ का नाम दिया जा सकता है। देश की जब आर्थिक स्थिति चरमराने लगी; औद्योगिक क्षेत्र विनाश के कगार पर पहुँचने लगे; लघु व्यापारियों में घोर आर्थिक निराशा व्याप्त हो गयी तथा जनसामान्य की कमर तोड़ी जा रही थी तब सरकार को होश आया।
अब नये फ़रमान के अनुसार, सभी प्रकार के रेस्टोरेंट में १८% से ५% जी०एस०टी० लागू होगा। १३ वस्तुओं को १८% की सीमा से हटाकर १२% के जी०एस०टी० के अन्तर्गत लाया गया।
यदि केन्द्र-सरकार का जी०एस०टी० राष्ट्रहित में है तो चार माह-बाद इतना बड़ा परिवर्त्तन सरकार को क्यों करना पड़ा है? जी०एस०टी० को ‘गुड और सिंपिल टैक्स’ कहनेवाले देश के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी का वही जी०एस०टी० अब राहुल गांधी का ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कैसे बन गया?
ज़ाहिर है, देश के व्यापारी जी०एस०टी० शिकंजे में जकड़ लिये गये हैं और इसी का विरोध गुजरात के व्यापारी करते आ रहे हैं। आसन्न गुजरात-चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के विरोध में अधिकतर व्यवसायी-वर्ग हैं। कहीं ऐसा तो नहीं, गुजरात-चुनाव को देखते हुए, केन्द्र-सरकार को इतना बड़ा परिवर्त्तन करने के लिए बाध्य होना पड़ा है?
इन सभी बिन्दुओं पर आप क्या सोचते हैं?
कुसुम शुक्ला- गुजरात के चुनाव को देख कर पलटी मारी है।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
आरती जायसवाल- सत्य कह रहे हैं। सर । अपरिपक्व अनुभव अथवा स्वार्थपूर्ण नफ़ा-नुक़सान की गणित । राजनीतिक ख़र्चे को पूरा करने और बड़े-बड़े लोनधारकों से हुई बैंकों की हानि की भरपाई के लिए बार- बार बदलाव किए जा रहे हैं । मँहगाई की बढ़ती दर, विकास की बढ़ती दर। अनावश्यक नियमों जैसे -बैंक में निम्नतम राशि अनिवार्य करना अन्यथा दण्ड स्वरूप राशि कटौती, लादकर निम्न मध्यम वर्ग की क़मर तोड़ना उज्जवला योजना के तहत मुफ़्त सिलेण्डर का कनेक्शन दे देना तत्पश्चात् दाम में कई गुना की वृद्धि कर के योजना उपभोक्ताओं को परित्याग करने को विवश कर देना व अन्य उपभोक्ताओं से वसूली का माध्यम बनाना आदि कई ऐसी चालाक नीतियाँ उनके क्रूर और अमानवीय छल अथवा अपरिपक्व होने का परिचय देती हैं।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- देश की त्रस्त जनता ब्याज-सहित अपना मूल वसूल करना जानती है।
आरती जायसवाल- हाँ। सर! सत्य कथन।
पुरुषोत्तम फौजदार- अनुभव हीन वित्तमंन्त्री के कारण की देश की अर्थव्यवस्था चरमारा रही है ।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- फिर भी देश की सरकार मौन है! ऐसा क्यों किया जा रहा है? क्या यह देश की आर्थिक नीतियों के साथ दुष्कर्म नहीं है?
जगन्नाथ शुक्ल- इनकी पलटियों की पूरी श्रृंखला है,अब इनकी सारी नीतियाँ केवल चुनाव को दृष्टिगत रखकर बनती हैं। यह दीगर बात है कि इससे देश की सेहत बिगड़ रही है।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ऐसे में जनसामान्य की कैसी भूमिका रहनी चाहिए? सरकार में “चोर-चोर मौसेरे भाई” को चरितार्थ किया जा रहा है।
सुधा मिश्र द्विवेदी- सहमत ।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ऐसा मज़ाक़ भविष्य में न हो, इसके लिए सरकार चलानेवालों को क्या-क्या करना होगा?
अमित कुमार पाठक- आप सही कह रहे है वित्तमंत्री अनुभव हीन है क्योंकि की काँग्रेस की तरह अरबों रुपये का घोटाला तो कर नहीं पा रहे । चापलूसों और दलालो को भी कुछ नहीं मिल रहा है तो शोर मचाया जाना वाजिब है ।
देवेन्द्र कुमार सिंह- सही करने पर भी चिल्लाते हैं लोग। गलत पर तो चाहिए ही।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- सिंह साहिब! सही-ग़लत का पैमाना आप किसे मानते हैं?
बुद्ध विलास विश्वकर्मा- अन्तर्राष्ट्रीय भाषा वैज्ञानिक, मीडिया विशेषज्ञ यदि इस विषय पर कुछ कह रहे हैं तो उसका कुछ न कुछ मतलब होगा। और आप शायद कांग्रेस, बीजेपी से बाहर निकल कर सोचिये ।गुजरात चुनाव के दौरान जीएसटी की दरें कम करने का क्या मतलब है? ये लोग क्या सन्देश देना चाहते हैं।
देवेन्द्र कुमार सिंह- आम जनता को राहत दी गयी यह बड़ी बात है, कब दी गयी यह आम आदमी के लिए बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा मेरा मानना है। डॉ पाण्डेय जी ने सबके विचार आमंत्रित किया है , अपनी ओर से कुछ थोपा नहीं है। आप श्रध्येय पाण्डेय जी को समझने की कोशिश कीजिये कि उन्होंने ऐसा क्यों लिखा है।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- पाठक जी! प्रतिक्रिया तभी ईमानदार दिखती है जब वह राजनीति के खोल से बाहर की होती है। कोई भी सरकार लोकहित में नीतियाँ बनाती है और कुछ अपने राजस्व के हित में, परन्तु यहाँ तो जो भी नीति बन रही है, लोकविरुद्ध दिख रही है। जी०एस०टी० का प्रारूप तैयार करने से पूर्व और पश्चात् में उसके समस्त अन्धकार-पक्ष पर विचार किया जाना चाहिए था; लागू किये जाने के बाद उसके परिणाम-प्रभावों का अध्ययन किया जाना चाहिए था, जो नहीं किया गया। ऐसा क्यों? प्रभावित पक्ष : जनसामान्य और व्यापारी-वर्ग के साथ विपक्षी राजनेताओं ने जब प्रबल विरोध किया तब सरकार को आत्म मन्थन करना पड़ा। यदि जी०एस०टी० का निर्णय सही था तो क्यों उसे बाद में आमूल-चूल परिवर्त्तन करना पड़ा है? आप इसका उत्तर दे सकते हैं?
अमित कुमार पाठक- डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जी सरकार ने अध्ययन के बाद ही gst दरों में परिवर्तन किया है ।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- विश्वकर्मा जी! दु:ख इसी बात का है कि कुछ लोग राजनीतिक खोल में रहकर इस सीमा तक प्रभावित हो जाते हैं कि उन्हें अपने दल की बुराइयाँ नहीं दिखतीं।

अमित कुमार पाठक- आप निष्पक्ष बात नहीं कर रहे है इसलिए मुझे इस तरह से कमेन्ट करना पड़ रहा है आप पत्रकार हैं आप को निष्पक्ष बात करनी चाहिए
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– यही अध्ययन लागू करने से पहले क्यों नहीं किया गया था? यह लोकतन्त्र है, कोई प्रयोगशाला नहीं। मैं नितान्त निष्पक्ष बात करता हूँ क्योंकि मेरी विचारधारा लोकतन्त्र की अवधारणा के साथ सम्पृक्त है।
सिंह साहिब! किसी को भी कोई विचार थोपने का अधिकार नहीं है। मन में ज्वलन्त विषय उठा। सोचा, शालीन बुद्धिजीवी मित्रवृन्द के साथ इस गम्भीर विषय को बाँटा जाये। राहत कब दी गयी, यह भी महत्त्वपूर्ण है। घर में आग लग जाये; सब भस्मीभूत हो जाये और उसके बाद अग्निशमन वाहन को भेजा जाये। कुछ ऐसी ही बात यहाँ भी दिखती है। गुजरात-चुनाव से इसे अलग करके नहीं देख सकते। यदि ऐसा नहीं था तो दो महीने बाद नये वर्ष के उपहार के रूप में भी दिया जा सकता था। इसे काँग्रेस लेकर आती अथवा अन्य कोई भी, इसी रूप में विरोध होता। काँग्रेस में ऐसी कौन-सी ख़ास बात रहती कि हम उसका समर्थन करते।
अमित कुमार पाठक- इसी GST को काँग्रेस लेकर आती तो दलाली कर रहे लोग कहते विकास हो रहा है और बहुत अच्छा निर्णय है । 70 वर्षों की जो लूट मची हुई है उस पर कोई विचार क्यों नहीं व्यक्त करते आप लोग…. भ्रष्टाचार का देश की अर्थव्यवस्था पर क्या अशर पड़ा है और 70 वर्षों में देश को जातिवाद और धर्म के नाम पर बाट कर अनुशुचित जाति और जनजातियो का क्रिस्चियन बनाया है उस पर भी विचार दीजीए
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- पाठक जी! विषय से मत भटकिए। यह किसी समाचार-चैनल का ‘विचार-मंच’ नहीं है, जहाँ सारे प्रवक्तागण ‘भँगेड़ी’ दिखते हैं। हमारी इस वैचारिकी का एकमात्र उद्देश्य सकारात्मक और प्रासंगिक तार्किक-ताथ्यिक क्षमता का विकास करना है, न कि किसी भी दल के प्रवक्ता के रूप में अपने को रेखांकित करना। इसलिए भविष्य में आप यहाँ निर्धारित विषय से इतर विचाराभिव्यक्ति नहीं करेंगे, आशा की जाती है।
अमित कुमार पाठक- आखिर क्या कारण है कि 70 वर्षों में सबसे अधिक अनुसूचित जातियों का क्रिस्चियन में परिवर्तन सबसे ज्यादा हुआ है और इसे रोकने में कांग्रेस असफल क्यों रही है । अल्पसंख्यको की समर्थक कांग्रेस ने अल्पसंख्यको के लिए क्यों नहीं मदरसों में आधुनिक, तकनीकी शिक्षा को लागू नही किया क्या कांग्रेस अल्पसंख्यक वर्ग को शिक्षित नहीं होने देना चाहती है यदि शिक्षित करना चाहते तो क्यों आधुनिक शिक्षा को लागू नहीं किया और धार्मिक शिक्षा ही क्यों दी जाती है
अरविन्द मालवीय- बस यही कहना है, मोहम्मद बिन तुगलक का नया अवतार । पुनः अवतरण दिल्ली से दौलताबाद.. दौलताबाद से दिल्ली… ।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- जनता चैतन्य है।
रवीन्द्र त्रिपाठी- सहमत हूँ ।
अनिल पाण्डेय- नकल करने के लिए भी अक्ल की जरूरत पड़ती है ।जीएसटी कांग्रेस ने बनाया था उसे लागू करने के मामले में कांग्रेस से चर्चा कर लेते ,उसके सुझावों पर ध्यान देते तो क्या नाक छोटी हो जाती ?
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- पाण्डेय जी! यहाँ काँग्रेस कहाँ से आ गयी?
अनिल पाण्डेय- जीएसटी किस सरकार ने प्रस्तावित की थी भारत में ?
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- यह मात्र एक सामूहिक संगोष्ठी है, न कि विषयान्तर बहस। विषय के मूल बिन्दु के अन्तर्गत मात्र वर्तमान सरकार की जी०एस०टी०-नीति पर प्रश्न उठाया गया है।