● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
“कहो उतना जितना ‘कर’ सको; रहो उतना जितना ‘रह’ सको; सहो उतना जितना ‘सह’ सको; बनो उतना जितना ‘बना’ सको; उड़ो उतना जितना पंख ‘सहन’ कर सके, अन्यथा तुम ‘उत्तर’ और मै ‘दक्षिण’।”
यह मेरा जीवन-सिद्धान्त और व्यवहार रहा है, जिसके साथ मै ‘किसी भी मूल्य पर’ समझौता नहीं करता। यही कारण है कि मै सबके साथ निभा नहीं पाता। जाने कितने चेहरे आये, जुड़े तथा कुछ दूर चले भी; परन्तु उनके ‘मन के पाँव’ संग और साथ नहीं चल पाये।
जैसे दो चेहरेवाले लोग होते हैं वैसे ही दो दृष्टिवाले भी होते हैं। गिरगिट-सदृश रंग बदलनेवाले लोग को भलीभाँति पहचान और समझ कर, उनसे सदा के लिए दूरी बना लेनी चाहिए। जहाँ प्रशंसा में अतिरेक दिखे और व्यवहार में भिन्नता, ऐसे लोग सर्वथा त्याज्य होते हैं। कथन और कर्म के धरातल पर मिथ्यानिष्ठ उच्छृंखल, उद्धत तथा उद्दण्ड दिखनेवाले लोग ‘घातक’ सिद्ध होते हैं; क्योंकि वे ‘परजीवी’ और ‘परमुखापेक्षी’ होते हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)