अलोपीदेवी और अलोपशंकरी नहीं, ‘आलोपीदेवी’ और ‘आलोपशंकरी’ कहें― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ

प्रयागराज मे अलोपीबाग़ (शुद्ध और उपयुक्त नाम ‘आलोपीबाग़’ है।) मुहल्ले मे एक प्रसिद्ध मन्दिर है, जिसे ‘सिद्धपीठ’ और ‘शक्तिपीठ’ भी कहा जाता है, जहाँ सुदूर क्षेत्रों से आबाल वृद्ध नर-नारी श्रद्धा-आस्था के साथ अपनी भक्ति प्रदर्शित करने के लिए जाते हैं। वह एक ऐसा मन्दिर है, जिसमे मूर्ति के स्थान पर झूलता हुआ एक ‘खटोला’/’पालना’ दिखता है। लोग उस मन्दिर को ‘अलोपीदेवी’ अथवा ‘अलोपशंकरी’ के नाम से जानते और मानते आ रहे हैं।

इस नाम को लेकर भाषाविज्ञानी एवं आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया है कि प्रसिद्ध अलोपीदेवी अथवा अलोपशंकरी से सम्बन्धित जो कथा प्रचलित है, उसके आधार पर उस मन्दिर का शुद्ध और उपयुक्त नाम ‘आलोपीदेवी’ अथवा ‘आलोपशंकरी’ होगा। कथा के अन्तर्गत बताया जाता है कि जिस स्थान पर शिवप्रिया सती के दायें हाथ का पंजा कटकर गिर गया था और गिरते ही लुप्त हो गया था, उस स्थान पर एक मन्दिर का निर्माण किया गया था। आचार्य का तर्क है कि उस मन्दिर मे देवि-मूर्ति के नाम पर प्रतीक के रूप मे केवल एक ‘खटोला’/’पालना’ टँगा हुआ है, जो लाल चुनरी मे लिपटा रहता है। जो चुनरी उस खटोले/पालने मे लिपटी रहती है, वह प्रथम दृष्ट्या एक नारी-रूप मे दिखती है। उस खटोले/पालने के नीचेवाले स्थान पर एक कुण्ड-सा दिखता है, जिसके भीतर जल रहता है। उस जल को चामत्कारिक माना गया है। श्रद्धालु दु:ख-दारिद्र्य दूर करने के उद्देश्य से उस जल का संस्पर्श करते है और पान भी।

भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– जब हम ‘अलोप’ शब्द पर विचार करते हैं तब ज्ञात होता है कि ‘अ’ का अर्थ ‘नहीं’ और ‘लोप’ का ‘लुप्त’ है। इसप्रकार ‘अलोप’ का अर्थ है, जो लुप्त ही न हो, जबकि वहाँ सती लुप्त हैं। इस दृष्टि से सही नाम ‘आलोपीदेवी’ और ‘आलोपशंकरी’ होगा; क्योंकि ‘आलोप’ का अर्थ है, ‘पूर्णत: लुप्त’।

आचार्य का कहना है वहाँ ‘गाँव-गिराँव’ से आनेवाले अपढ़ भक्तों की संख्या ‘पढ़ भक्तों’ की संख्या से कहीं अधिक रहती है, जिनमे ‘आलोप’ के स्थान पर ‘अलोप’ प्रचलित हो गया।

अब सुशिक्षितजन का गम्भीर दायित्व है कि जनसामान्य को उक्त कथा को समझाते हुए, ‘अलोपीदेवी’ और ‘अलोपशंकरी’ के स्थान पर शुद्ध और उपयुक्त नाम ‘आलोपीदेवी’ और ‘आलोपशंकरी’ का प्रचलन करायें। पण्डित-पुजारी जिस कथा को सुनाते हैं, उसमे तो देवी को लुप्त बताया गया है; ऐसे मे समस्त पण्डित-पुजारियों का परम दायित्व है कि वे ‘अलोपीदेवी’ और ‘अलोपशंकरी’ के स्थान पर शुद्ध शब्द ‘आलोपीदेवी’ अथवा ‘आलोपशंकरी’ की प्रतिष्ठा करें।

इस दृष्टि और निष्कर्ष के आधार पर ‘अलोपीदेवी’ और ‘अलोपीशंकरी’ के स्थान पर ‘आलोपीदेवी’ और ‘आलोपशंकरी’ का ही व्यवहार किया जाना चाहिए, अन्यथा सम्बन्धित कथा का कहीं-कोई औचित्य ही नहीं रह जायेगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)