सरकारें को संवैधानिक दायित्व के निर्वहन मे पीछे क्यों

आखिर वर्तमान सरकारों को संवैधानिक दायित्व के रूप में चार काम (जनता के चार जनाधिकार – प्रतिव्यक्ति न्यायोचित रूप से पूर्ण शिक्षा-प्रशिक्षण/प्रतिपरिवार एक रोजगार के न्यायोचित अवसर व संसाधन/प्रति गाँव समानुपातिक सार्वजनिक सेवा-सुविधा व प्रत्येक वर्ग के लिए संरक्षण सेवाएं इत्यादि) पूरे करने में समस्या क्या है?

सोचिये…!

आज़ादी के बाद पिछले 75 सालों से अबतक देश की जनता के लिए जब स्पष्ट रूप से 4 महत्वपूर्ण जनाधिकारों के बारे में आर्थिक न्याय, सामाजिक न्याय व राजनैतिक न्याय के रूप में भारतीय संविधान के प्रथम पेज उद्देशिका में मोटे अक्षरों में विभिन्न संवैधानिक पदों पर बैठे शासन-प्रशासन के लोगों के लिए दायित्वों/कर्तव्यों का अनिवार्य रूप से निर्वहन करने का वर्णन किया गया है।
तो फिर यह अनिवार्य कार्य अबतक पूर्ण क्यों नही हुआ?

ऐसा भी नही है कि वर्तमान कथित बुद्धिजीवियों को उपरोक्त चारों जनाधिकारों को सरकारों द्वारा वितरित किये जाने के बारे में जानकारी नही है।
इस देश मे बड़े से बड़ा संविधानविद् भी यह बात भलीभाँति जानता है फिर भी उनकी चुप्पी व उदासीनता शक़ पैदा करती है।

आज की कमर्शियल TV News में बैठकर बोलने वाले चाहे वो कथित पत्रकार हों या बड़े अखबारों में अपनी सम्पादकीय लिखने वाले संपादकगण हों या फिर बड़े-बड़े संस्थानों/ट्रस्टों/NGO’s में बैठकर अपनी बुद्धिजीविता की दुकान चला रहे वो कथित समाजसेवी हों या वर्तमान नेता-मंत्री हों इन्हें भलीभाँति जनता को वितरित किये जाने वाले इन चारों जनाधिकारों के बारे में जानकारी है लेकिन इन 5% धूर्तों ने चुप्पी साध रखी है।

क्योंकि उन्हें अच्छे से पता है यदि ये चारों जनाधिकार देश की जनता को न्यायोचित रूप से वितरित किया गया तो जनता फिर इनकी मक्कारी के जाल में कभी नही फँसेगी।

न ये देश की 95% साधारण जनता को पूर्ण रूप से शिक्षित-प्रशिक्षित करने के अवसर व संसाधन देना चाहते हैं।
और न ही जनता को प्रतिपरिवार पात्रतानुसार एक रोजगार का अवसर व संसाधन देना चाहते हैं।
और न ही ये लोग 95% गाँवों/मुहल्ले वासियों को सड़क/पीने का साफ़ पानी/समुचित बिजली/संचार/परिवहन इत्यादि सार्वजनिक सेवाएँ-सुविधाएं देना चाहते हैं।
और न ही ये लोग देश के सभी वर्गों को बीमा/बैंकिंग/स्वास्थ्य/पेंशन/सेल्टरिंग जैसी संरक्षण सेवाएँ वितरित करना चाहते हैं।

इन धूर्तों को भलीभाँति पता है उपरोक्त चारों जनाधिकारों के न्यायोचित वितरित होते ही देश की जनता की सभी नारकीय जीवनलीला समाप्त हो जाएगी और सम्पूर्ण जनता इन 5% धूर्तों/भेड़ियों की मानसिक गुलामी से भी मुक्त हो जाएगी।

बस इतनी सी बात ही है जो आज़ादी के बाद से पिछले 75 सालों में जनता के लिए नही किया गया न आवाज़ उठाई गई इन कथित बुद्धिजीवियों द्वारा।

इन धूर्तों को यह भी भलीभाँति पता है कि देश की 95% अशिक्षित/कुशिक्षित/अल्पशिक्षित जनता तबतक अपने उपरोक्त चारों जनाधिकार के लिए आवाज़ नही उठा सकती जबतक कि जनता को किसी के द्वारा उपरोक्त चारों जनाधिकारों के प्रति जानकार व जागरुक नही किया जाएगा।

इन धूर्तों को ये भी अब भलीभाँति ज्ञात हो चला है कि इसी देश मे एक राजनैतिक पार्टी है जो पिछले 10 सालों से सम्पूर्ण विश्वभारत की न्यायप्रिय जनता को उनके चारों जनाधिकारों के प्रति जानकार व जागरूक करने में दिनरात लगी है।

आप सभी न्यायप्रिय पाठकगणों को भी इस राजनैतिक पार्टी का हिस्सा बनकर न्यायशील समाजिकता के विस्तार में सहयोग करने हेतु आगे आना चाहिए व अपनी पात्रता सिद्ध करके वर्तमान कुराजनीति की जगह एक न्यायशील महालोकतंत्रीय व्यवस्था (जनता के द्वारा जनता के लिए अपने 12 मताधिकारों द्वारा किसी भी व्यवस्थागत कानून अर्थात नियम नीतिनिर्णय को पारित/खारिज करना) के विस्तार हेतु न्यायनेता बनने की ओर अग्रसर होना चाहिए।

✍️🇮🇳 (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)