शिक्षाजगत् मे भाषा-व्याकरण के प्रति उदासीनता समाप्त हो– आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा गुणवत्ता परियोजना प्रकोष्ठ के तत्त्वावधान मे ७ दिसम्बर, २०२२ ई० को शासकीय महाविद्यालय जयसिंहनगर के हिन्दी एवं समाजशास्त्र-विभाग की ओर से द्विदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के प्रथम दिवस में व्याख्यान और शैक्षिक कर्मशाला का आयोजन किया गया, जिसका डॉ० पंकज श्रीवास्तव, अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा रीवा-संभाग, रीवा ,आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय, भाषाविज्ञानी और समीक्षक (प्रयागराज) तथा महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ० धर्मेन्द्र कुमार द्विवेदी ने दीप-प्रज्वलन कर उद्घाटन किया और सरस्वती की मूर्ति पर माल्यार्पण किया। महाविद्यालय की छात्राओं ने सरस्वती-वन्दना की और स्वागत-गीत गाया। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ० धर्मेंद्र कुमार द्विवेदी ने समस्त कार्यशाला में उपस्थित अध्यापको, विद्यार्थियों तथा अतिथियों के लिए स्वागत-भाषण करते हुए, कार्यक्रम की सफलता की कामना की। अतिरिक्त संचालक महोदय डॉ० पंकज श्रीवास्तव ने उपस्थित सभी सहभागियों के मंगलमय भविष्य की कामना की और जयसिंहनगर महाविद्यालय की इस एक और उपलब्धि के लिए बधाई दी। कार्यक्रम का संचालन कर रहे हिन्दी-विभागाध्यक्ष डॉ० मंगल सिंह अहिरवार द्वारा राष्ट्रीय कार्यशाला का संक्षिप्त परिचय दिया गया। समाजशास्त्र-विभाग की सह संयोजक डॉ० प्रमिला वास्केल जी की तत्परता महत्त्वपूर्ण रही।
व्याख्यान-माला के क्रम में डॉ० नीरज श्रीवास्तव, प्राचार्य, केशवाही ने कहा, “साहित्य और समाज एक-दूसरे पर आश्रित हैं और समाज के अभाव में साहित्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती।” डॉ० विजय पाण्डेय, शासकीय अग्रणी महाविद्यालय, शहडोल ने कहा, “हमारा सम्पूर्ण साहित्य समाज से अनुप्राणित है इसी क्रम में डॉ० प्रदीप कुमार विश्वकर्मा, शासकीय महाविद्यालय, मऊगंज का विचार था, “साहित्य समाज को संघटित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है, इसलिए साहित्य की उपयोगिता और महत्ता स्वतः सिद्ध हो जाती है।
इस आयोजन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष प्रयागराज से पधारे भाषाविज्ञानी और समीक्षक आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की कर्मशाला रही, जिसमे उन्होंने स्थानीय और बाहर से आये हुए अध्यापक-अध्यापिकावर्ग और महाविद्यालय की छात्र-छात्राओं को उच्चारण और लेखन-स्तर पर शब्द-व्यवहार करते समय किन-किन बारीक़ियों का ध्यान करना चाहिए, इसके प्रति जागरूक किया। इसी क्रम में उन्होंने कहा, “आज व्याकरण की दशा और दिशा अत्यन्त शोचनीय है। इसके लिए शासन-स्तर पर ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है, ताकि प्राथमिक स्तर से ही विद्यार्थियों को शुद्ध लेखन करने के प्रति जिज्ञासु बनाया जा सके।” बड़ी संख्या में उपस्थित विद्यार्थियों और अध्यापक-अध्यापिकाओं ने शब्दप्रयोग से सम्बन्धित कई किये, जिनके कारणसहित उत्तर देकर आचार्य ने सभी को संतुष्ट किये।
आचार्य ने अपनी कर्मशाला मे आमन्त्रण-निमन्त्रण, फूल-कली, लिए-लिये श्रीमति-श्रीमती , डॉ०-डॉ. भागवत-भगवत, भारद्वाज-भरद्वाज, अनुस्वार-अनुनासिक, पीएच्० डी०-पीएच० डी०, ध्यान करना, व्याख्यान करना, अंकों के शुद्ध उच्चारण वाले शब्द, उपसर्ग-परिवर्त्तन आदिक बड़ी संख्या में अशुद्ध शब्दों को व्याकरणिक आधार पर कैसे शुद्ध किया जाये और कैसे समझा जाये, कौन-सा शब्द सार्थक है और कौन-सा निरर्थक, इसे उन्होंने लिखकर और बताकर समझाया।
आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने अध्यापक-अध्यापिकाओं और विद्यार्थियों को मंच पर बुलाकर शुद्ध लेखन और वाचन कराकर कर्मशाला की अवधारणा को सिद्ध किया और पुष्ट भी।
इस अवसर पर डॉ० मंगल सिंह, प्रभारी प्राचार्य, शासकीय महाविद्यालय गोहपारू, डॉ० नीरज श्रीवास्तव प्राचार्य, शासकीय महाविद्यालय केशवाही, डॉ० आर० एस० बाटे, शासकीय महाविद्यालय जैतहरी, प्राचार्य, सम्मानीय श्यामली दुबे तथा डॉ० सुनीता सिंह मरकाम, विभागाध्यक्ष– हिन्दी, अग्रणी कन्या महाविद्यालय, शहडोल उपस्थित थे। इनके अतिरिक्त नगर से पधारे गण्यमान्यजन मे देवा पयासी, पार्षद जयसिंहनगर , पंकज पाण्डेय, पत्रकार जयसिंहनगर, राम नारायण पाण्डेय, भा०ज०पा०-मण्डल, अध्यक्ष, राकेश गुप्ता, पत्रकार एवं मीडिया-प्रभारी के अतिरिक्त महाविद्यालय के समस्त परिवार मे प्रो० गजेन्द्र परते, समन्वयक आई० क्यू० ए० सी०, डॉक्टर ममता पाण्डेय, डॉ० राजेन्द प्रसाद वर्मा, लवकुश, दीपेंद्र, उत्तम सिंह, प्रो० सतीश वर्मा, डॉ० यदुवीर मिश्र, डॉ० अर्चना जायसवाल, डॉ० मोनिका सोलंकी, डॉ० कमलेश जायसवाल, डॉ० मो० मुनव्वर अली, जसीम अहमद, भगवत राज बरमैया, नीलेश कुमार प्रजापति, जितेन्द्र मोहन श्रीवास्तव, महेन्द्र साकेत, सुखेन्द्र पटेल, अनिल कुमार वर्मा, प्रीतम सिंह परस्ते, विपिन कुमार गुप्ता, अजीत कुमार कुशवाहा तथा विद्यार्थियों की गरिमामय उपस्थिति रही।