आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला
‘सृजन’ शब्द शैक्षिक और साहित्यिक वातावरण मे ऐसे घुल-मिल गया है, जैसे ‘दूध मे पानी’। उस दूध मे कितना पानी (पानी का भिन्नार्थक :– जल; चमक; प्रतिष्ठा) है, इसे समझने के लिए ‘व्याकरण’ नामक सूक्ष्म उपकरण की सहायता लेनी पड़ती है। व्याकरण के अन्तर्गत ‘उपसर्ग’, ‘धातु’ तथा ‘प्रत्यय’ ऐसे सहायक अंग होते हैं, जो अशुद्धि (अशुद्धता) को शुद्धि (शुद्धता) के क्षेत्र से बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। यही कारण है कि हमारे देश के जितने भी ‘दिखावटी’ ज्ञानी हैं, ‘व्याकरण’ के नाम पर कोसों की दूरी पर दिखते हैं, परिणामत:- प्रभावत: देश के किसी भी शैक्षणिक और साहित्यिक संस्थानो मे आज तक ‘विशुद्ध’ (शास्त्रीय) व्याकरण और भाषाविज्ञान से सम्बन्धित कोई कर्मशाला आयोजित नहीं हुई और न ही व्याख्यानमाला ही। खेद का विषय है कि हमारे विश्वविद्यालयों और संघटक महाविद्यालयों मे शासकीय नियमानुसार भाँति-भाँति की ‘कार्यशालाएँ’ आयोजित की जाती हैं, जबकि वे विशुद्ध रूप से ‘संगोष्ठी’ वा (अथवा) ‘व्याख्यानमाला’ होती है। यहाँ भी शब्दप्रयोग मे संगति नहीं दिखती; क्योंकि उपयुक्त शब्द ‘कर्मशाला’ है। हम कर्म करते हैं, न कि कार्य करते हैं। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ (‘श्रीमद्भागवद्गीता’ अशुद्ध है।) ‘कर्म’ करने का उपदेश करती है। (यहाँ ‘देती है’ अशुद्ध है।)
‘कर्मशाला’ मे परीक्षण (अन्त: क्रिया) और निरीक्षण (बाह्य क्रिया) की भूमिका होती है। उसमे मार्गदर्शक वा प्रशिक्षक होता है, न कि उपदेशक, भाषणकर्त्ता, व्याख्याता आदिक। वह मार्गदर्शक/ प्रशिक्षक प्रशिक्षुओं को बताता, सिखाता, समझाता, लिखाता है तथा प्रशिक्षु क्या लिख रहे हैं, उसके प्रति भी सजग रहता है। इसके लिए मौखिक और लिखित बौद्धिक ‘सामर्थ्य’ का रहना अपरिहार्य हो जाता है। यदि वैसा हुआ रहता तो आज ‘सृजन’ के स्थान पर ‘सर्जन’ का व्यवहार मौखिक और लिखित भाषाओं मे हो रहा होता और अपने हाथों अपनी पीठ ठोंक (‘ठोक’ अनुपयुक्त है।) रहे, पढ़े-लिखे-कढ़े लोग ‘कुतर्क’ नहीं कर रहे होते। हमारे सभी व्याकरणाचार्य और भाषाविज्ञानी यदि अपने दायित्व का वस्तुत: बहुविध (‘बहुविधि’ अशुद्ध है।) निर्वहण (‘निर्वाहण’, ‘निर्वहन’ तथा ‘निर्वाहन’ अशुद्ध हैं।) किये होते तो आज जिस अर्थ मे ‘मिष्ठान, मिष्ठान्न’, ‘आरोपी’, ‘प्रावधान’, ‘वैज्ञानिक’, ‘रंग-बिरंगे’, ‘जन्मदिन’, ‘दो दिवसीय’, ‘डॉ., प्रो.’ ‘जयंती समारोह’ आदिक सहस्रों (‘सहस्त्रों’ अशुद्ध है।) शब्दों के अशुद्ध व्यवहार किये जा रहे हैं, वे क्रमश: ‘मिष्टान्न’, ‘आरोपित’, ‘प्रविधान’, ‘विज्ञानी’, ‘रंग-विरंगे’, ‘दिनांक’, ‘द्विदिवसीय’, ‘डॉ०, प्रो०’ तथा ‘जयन्ती’ के शुद्ध रूप मे पढ़े, पढ़ाये तथा लिखाये जा रहे होते।
अब आइए! मूल विषय पर केन्द्रित हो लें।
‘सृजन’ निरर्थक शब्द है। ‘सृज्’ धातु मे ‘ल्युट्’ प्रत्यय के योग से ‘सर्जन’ (रचना, सृष्टि तथा कृति) शब्द की उत्पत्ति होती है। हमारे देश मे जितने भी विद्वज्जन (विद्वत्जन और विद्वत्जनों अशुद्ध है।) हैं, वे ‘सृजन’ शब्द का प्रचार-प्रसार करते आ रहे हैं, वे बता सकते हैं– आप यदि ‘सृजन’ शब्द को शुद्ध मानते हैं तो ‘विसर्जन’ के स्थान पर ‘विसृजन’ का व्यवहार क्यों नहीं करते? निस्सन्देह, इस प्रश्न पर ‘सृजन’ के प्रयोगकर्त्ता मौन हो जायेंगे; क्योंकि व्याकरण के अंग-उपांग उन्हें इस भाँति जकड़ लेंगे कि ‘मुक्ति का मार्ग’ दिखेगा ही नहीं। समस्तरीय अनेक शब्द हैं; जैसे– अर्जन, गर्जन, तर्पण, कर्षण इत्यादिक। ये सभी शब्द उसी नियम के अन्तर्गत बँधे हुए हैं, जिसके अन्तर्गत ‘सर्जन’ शब्द अनुशासित लक्षित होता है। (दिखायी पड़ता है।)
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ दिसम्बर, २०२२ ईसवी।)