अनीता सिंह-
बीते लम्हों का हिसाब मिलाने निकले
गाँठ खोली तो यादों के खजाने निकले।
जिन रकीबों को हम दर्द सुनाने निकले
मेरी उम्मीद के कातिल वो पुराने निकले।
जिनसे मिलने को हम कर के बहाने निकले
उनके दर भी तो दुश्मन के ठिकाने निकले।
कुछ तो ऐसे थे अपने जो बेगाने निकले
जिनकी यादों को भुलाने में जमाने निकले।
मेरी महफ़िल में जो आये थे सयाने निकले
सुनने वाले तो सभी लोग दीवाने निकले।
छोटी सी ज़िन्दगी के इतने फ़साने निकले
जब भी गाया ग़मगीन तराने निकले।
तल्ख़ यादों को इस दिल से मिटाने निकले
दिल के सब दर्द दरिया में सिराने निकले।
बन्द बक्से से कुछ ख़त जो पुराने निकले
आँख भर आईं जब उनको जलाने निकले।
बेदिली से जीये जिस पल को भुलाने निकले
मेरे जीवन के वो लम्हात सुहाने निकले।