जगन्नाथ शुक्ल..✍(प्रयागराज)-

दिल के अरमाँ दबाने से पहले।
मोहब्बत छुपाया ज़माने से पहले।।
कहीं लग न जाए खुद की नज़र ही;
सवाली बनाया निभाने से पहले।
ख़तम हो रही है, साँसों की सियाही;
लिखो ख़त, कज़ा के आने से पहले।
ये ज़ुल्मी ज़माना, सितम ढा रहा है;
खुद को सँभालो बुलाने से पहले।
कहीं दिल की धड़कन ठहर ही जाये;
ये समझो ज़रा ख़त जलाने से पहले।
भरोसा किसी का न टूटे ‘जगन’ से;
मोहब्बत की अर्थी उठाने से पहले।