ख़मोशी में भी उनके कितनी अदब है

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद)


ख़मोशी में भी उनके कितनी अदब है,
यही  तो मोहब्बत का पहला सबब है।

न बहके   क़दम  जिनके  तन्हाइयों  में ,
तभी दिल  को  बस उन्हीं की तलब है।

पलटते  हैं चिलमन ज़रा -सी हवा से,
मगर  वो  हैं  ठहरे  बड़ा  ही गज़ब है।

मैं जिस पल को हुआ गुज़रा मान बैठा,
वो  मेरा  सनम  था या फ़िर कोई रब है।

‘जगन’ रौशनी की दिखी लीक तुमको,
पकड़ लो नहीं ज़िन्दगी स्याह शब है।