ग़ज़ल : रिवाजेइश्क का मारा हुआ हूँ मै

राहेइश्क़ मे पाने से ज़्यादा लोग खोते हैं।
इस रिवाजेइश्क का मारा हुआ हूँ मै।
राह-ए-इश्क़ चलकर ख़ुद को जला दिया।
चौसर-ए-इश्क़ की बाजी हारा हुआ हूँ मै।
इश्क़ के सितम की इन्तहा देखने निकला था।
इतना कुचला गया कि धूल बन गया हूँ मै।
इश्क़ की बज़्म मे सबने पागल कहा।
अब तो लगने लगा शायद पागल हूँ मै।
कज़ा-ए-आरज़ू दरम्यां बस जी रहा राघव।
झूठी हैं साँसें ये कब का मर गया हूँ मै॥