वो दिन भी थे ज़माना जब हमारी बात करता था

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ-


सुहाने पल न जाने क्यूँ ख़्यालों में नहीं आते |

अन्धेरों में हैं खोए सब उजालों में नहीं आते ||

नहीं बुझती प्यास मेरी बहुत ज़्यादा मैं प्यासा हूँ |

कभी भी अब तुम्हारे लब प्यालों में नहीं आते ||

वो दिन भी थे ज़माना जब हमारी बात करता था |

तुम्हारे नाज़ मेरे अंदाज़ सवालों में नहीं आते ||

चले सँग थे रहे पीछे अकेला कर गए मुझको |

जो जल जलकर के बुझते हैं मशालों में नहीं आते ||

हो चुन चुनकर कदम चलना ज़रूरी तो मेरी मानो |

हों रेशम से जो रस्ते वो उफालों में नहीं आते ||

कोई मन’ को सहारा अब नहीं देता कहाँ जाएं |

जो छोड़ें सँग शख़्स ऐसे मिसालों में नहीं आते ||

 

उफाल = लम्बे कदम