राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’

खेलने की उम्र में फैले हैं हाथ देखो ।
कुदरत भी क्या अजब है
इसके कमाल देखो ?
तुतलाती भाषा में बच्चे,
कितने प्यारे लगते हैं ।
शैतानी कर-कर इठलाते,
सबसे न्यारे लगते हैं ।
जब ये बच्चे किसी के आगे,
बेबस होकर झुकते हैं ।
दे दो बाबू पैसे दे दो,
कहकर पैर पकड़ते हैं ।
फट जाते पाषाण हृदय भी,
ये जीवन कैसा देखो ?
खेलने की उम्र में फैले हैं हाथ देखो ।
कोई झटकता हाथ को इनके,
कोई देता गाली ।
कोई देता झिड़की इनको,
कोई भगाता खाली।
जिन हाथों में किताब होनी थी,
भिक्षापात्र दीखता है ।
इस समाज का पालनहारा,
खुद से आज खीझता है ।
धर्म मौन मानवता अन्धी,
सड़कों पर बचपन देखो ।
खेलने की उम्र में फैले हैं हाथ देखो ।
दिखी एक दिन एक बालिका,
एक ट्रेन के डिब्बे में ।
माँग रही थी थोड़ा भोजन,
लेकर आँसू आँखों में ।
भूख-प्यास से व्याकुल वो विक्षिप्त दिखाई देती थी ।
आधे भारत की प्रतिकृति वह लाचार दिखाई देती थी ।
जूठन पाकर इस समाज की
वह काया चमक उठी देखो ।
खेलने की उम्र में फैले हैं हाथ देखो ।
जब से आज किताबें हाथों में सबके आती हैं ।
सन्तानें दरिद्र ये भारत की
भीख माँग कर खाती हैं ।
अन्धी माँ लाचार बाप को,
कल के ये बच्चे पाल रहे ।
बदनसीब जीवन के रथ को
ये हंसते-हंसते हाँक रहे ।
है बाज़ार इनका कॉलेज और
ट्रेन क्लास देखो ।
खेलने की उम्र में फैले हैं हाथ देखो ।।