● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
ज्ञानवापी मस्जिद, वाराणसी मस्जिद मे उन्हें पूजा-पाठ आदिक करने का अधिकार मिले, इसे लेकर राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, रेखा पाठक, सीता साहू तथा मंजू व्यास नामक महिलाओं ने ‘विश्व वैदिक सनातन-संघ’ के प्रमुख जितेन्द्र सिंह बिसेन के नेतृत्व मे ज़िला न्यायालय, वाराणसी मे १८अगस्त, २०२१ ई० को अपनी-अपनी याचिका प्रस्तुत कर दी थी,जबकि आगे चलकर, जितेन्द्र सिंह बिसेन ने अपनी याचिका वापस ले ली थी और महिलाओं के नेतृत्व करनेवाली राखी सिंह ने अपने क़दम खींच लिये थे। इतना ही नहीं, एक वरिष्ठ अधिवक्ता विजयशंकर रस्तोगी का कहना है– जिस आधार पर महिलाओं ने वाद (मुक़द्दमा) किया है, उनमे कोई दम नहीं है; क्योंकि मुक़द्दमा ही ग़लत लिखवाया गया है, इसलिए प्रार्थनापत्र देकर शेष महिलाएँ भी अपनी याचिकाएँ वापस ले सकती हैं। उन महिलाओं ने नियमित रूप से देव-देवी पूजन करने मे अपनी असुविधा होने तथा वहाँ अन्य देव-देवी की खोज कराने के लिए याचिकाएँ प्रस्तुत की थीं। हमे नहीं भूलना चाहिए कि अभी न्यायालय की ओर से इस विषय पर सुनवाई की जायेगी– जिस प्रकरण को लेकर कथित हिन्दू-महिलाओं ने याचिकाएँ प्रस्तुत की हैं, वे सुनवायी के योग्य हैं अथवा नहीं?
उल्लेखनीय है कि उन महिलाओं को बहुत ही चतुराई से सामने लाकर यह ‘खेल’ खेला गया है। प्रथम दृष्ट्या अब वे महिलाएँ न्यायालय के कटघरे मे अनेक प्रश्नचिह्नों के साथ खड़ी कर दी गयी हैं। उन पाँचों महिलाओं को ‘विश्व वैदिक सनातन-संघ’ की सदस्या बताया गया है। अब वे न्यायालय के प्रश्न-प्रतिप्रश्नो का सामना कर सकती हैं। ‘सस्ती’ लोकप्रियता बटोरने के लिए भी उन महिलाओं ने स्वयं का ‘इस्तेमाल’ कराया हो, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता।
कैसे? समझें। ज्ञानवापी मस्जिद-परिसर का विधिवत् सर्वेक्षण कराने के बाद ‘सर्वेक्षण-प्रतिवेदन’ (रिपोर्ट) की एक-एक प्रति सील लगे लिफ़ाफे के साथ दे दी गयी थी। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने अपने निर्देश मे सुस्पष्ट शब्दों मे इस आशय की बात कही थी– सर्वेक्षण को गोपनीय रखा जाये और उस विवादित स्थल पर किसी अवांछित तत्त्व को प्रवेश नहीं करने दिया जाये।
ऐसे मे, प्रश्न है, सर्वेक्षण-प्रतिवेदन तो याचिकाकर्त्रियों को सीलबन्द लिफ़ाफे मे रखकर सौंपा गया था, फिर ‘सर्वेक्षण-प्रतिवेदन’ सार्वजनिक किसने कर दिया था? देश और विदेश के समाचार-चैनलों तक गोपनीय ‘सर्वेक्षण-प्रतिवेदन’ कैसे पहुँच गया था और किसने पहुँचाया था? प्रतिवादी-पक्ष ने न्यायालय से ‘सर्वेक्षण-प्रतिवेदन’ कैसे सार्वजनिक हो गया है, इसे लेकर भी मुक़द्दमा कर दिया गया है और न्यायालय की ओर से इसका स्वत: संज्ञान किया जाना निश्चित है। न्यायालय के सम्बद्ध न्यायाधीशों को चाहिए कि जितने भी समाचार-चैनलों ने ‘न्यायालय की अवमानना’ की है, उन सभी के विरुद्ध कठोर आदेश प्रसारित करे, ताकि ‘मीडिया की कथित स्वच्छन्दता’ पर नियन्त्रण किया जा सके।
निस्सन्देह, प्रथम दृष्ट्या उन चारों याचिकाकर्त्रियों को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, जिन्हें कि देखा जाना उचित भी है। यह सीधे तौर पर ‘न्यायालय की अवमानना’ है और इसे लेकर न्यायालय की दृष्टि टेढ़ी भी हो चुकी है। इस तरह से वे चारों महिलाएँ अपने ही कुचक्र मे फँस चुकी हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ जून, २०२२ ईसवी।)