युद्ध देखा है कभी ?

प्रभात सिंह-


बचपन से शायद 12वीं क्लास तक मुझे अजीब सपने आते थे। अक्सर सपने में, एक खौफनाक हलचल हुआ करती थी। चारो तरफ घुप्प अँधेरा। अँधेरे में कहीं कहीं दूर घरौंदों के उस पार तेज़ रौशनी चमकती हुयी दिखाई देती थी। आसमान में गड़ गड़ की आवाज़ें, घरों की दीवारों से कूदते फांदते 7-7 फिट के संदिग्ध लोग, लंबे लंबे पठानी कुरता पैजामा पहने हुए, सर पर बड़ा सा साफ़ा बांधे हुए, दाढ़ी लंबी खूब लंबी, हाँथ में लंबी लंबी बंदूकें लिए। भागते रहते थे जैसे पगबाधा दौड़, और बाधा घरों की दीवारें। गलियों में सन्नाटे को भेदती उनकी बूटों की आवाज़े। मैं किसी एक बंद खिड़की के सुराग से देखता रहता सब। फिर एका एक आसमान में गड़ गड़ करते हेलीकॉप्टर उतरते हैं, घरों की छत पर तो कहीं पास की क्रिकेट ग्राउंड पर। उनमें सब पर यू एस आर्मी लिखा होता, उनमें से दैत्यों की तरह उतरते अत्याधुनिक उपकरणों से लैस लड़ाके। खूब संघर्ष होता दोनों के बीच।दूर कहीं मैदान में बम और गोलों की रौशनी और फिर आवाज़े आती थी। लेकिन उन सबके के बीच कहीं भी आम लोगों के चीखने चिल्लाने की आवाज़ें नहीं होती थी। पूरी रात अँधेरा गोलियों की आवाज़ें हेलीकाप्टर की आवाज़ से थर थराती शीशे की खिड़कियां। दिन उगते ही उस रात के मंज़र की निशानियाँ मिलती थी लेकिन ताजजुब होता था जान का कोई नुक्सान नहीं। उस युद्ध में कौन नेक नियति था कौन बुरी नियति का कभी पता नहीं लगा। केवल ताकत वर अमेरिकी लड़ाकों को मैं अच्छी नियति का मान लेता था। हाँ एक बात और उन सपनों में कभी पाकिस्तान नहीं आया।
रात भर चले युद्ध के बाद दिन भर चर्चा होती थी की अफगानिस्तान और अमेरिका में युद्ध चल रहा है। पर वो युद्ध हमारे यहाँ क्यों हो रहा है, वो जवाब नहीं आया कभी सपने में। पर तसल्ली रहती थी कि उस युद्ध में आम अवाम सुरक्षित रहते थे। आज जब युद्ध की बातें होती हैं तो सोचता हूँ कि अमेरिका और अफ़ग़ानिस्तान दोनों ही भारत के कुछ कुछ मित्र देश से लगते हैं, और पाकिस्तान दुश्मन, युद्ध निति और युद्ध के इतिहास के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखता। इसलिए कौतुक रहता है कि वो सपनें क्यों आते थे। हालाँकि पिताजी भारतीय वायुसेना में थे, तब कभी कभी एयर फोर्स में ड्रिल की वजह से ब्लैक आउट होता था। और अक्सर लड़ाकू विमानों की प्रैक्टिस के दौरान घर के खिड़की दरवाज़े धड़ धड़ाने लगते थे।
कुछ भी हो, लेकिन युद्ध के नृशंश व्यवहार अनैतिक युद्ध नीतियों से डर लगता है। कहा गया है प्रेम और युद्ध में सब कुछ ज़ायज़ है। लेकिन प्रेम हो जाता है जिसपर हमारा बस नहीं, पर युद्ध तो गढ़े जाते हैं और युद्ध की रणनीति बनाने वाला युद्ध के आखीर तक बचा रहता है।