क्या यही है समाज

प्रधान संपादक,      इण्डियन वॉयस 24

राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’


ऐसे कलुषित समाज में लेकर जन्म

वर्ण कुल सब मेरा श्याम हो गया ।

बड़ी दूषित है सोच

कर्म भी काले हैं

गहन तम में

अस्तित्व इनका घुल गया ।

देखकर यह समाज

होती है घुटन आज ।

कैसा है समाज इसे आती नहीं लाज ?

नर्क से निकाल कर

दुनियाँ में जो लायी ।

शून्य मन में ज्ञान की

जिसने ज्योति जलायी ।

जिसका शोणित पीकर

जीवन मिलता है ।

जिसकी ममता के नीचे

ब्रह्माण्ड पनपता है ।

आज चतुर्दिशि ममता के

दामन में लगते दाग ।

कैसा है समाज इसे आती नहीं लाज ?

जगत जननी आज अगणित

अत्याचार सहती है ।

अपनी ही कृतियों के कारण

कष्टों में आज रहती है ।

अन्तर्मन झकझोर रहा है

क्यों जुल्म हजार ये सहती है ?

प्रेम वत्सला क्यों आख़िर

कभी नहीं कुछ कहती है ?

अपनी सहनशीलता के ही

चक्रव्यूह में फंसी आज ।

कैसा है समाज इसे आती नहीं लाज ?

औरत को शक्ति कहता है

औरत की ही भक्ति करता है ।

सरे बाज़ार औरत को ही

ये इंसान बेइज़्ज़त करता है ।

नारी समाज के लिए हर एक मन में

पूर्वाग्रह भरा है ।

अपने ही घर में क़ैद नारी की

यह एक दुःखद कथा है ।

अधिकारों से वंचित आधी आबादी

क्या यही है समाज ?

कैसा है समाज इसे आती नहीं लाज ?