आकांक्षा मिश्रा, गोंडा

गाँवों की गलियों से
निकलकर
शहरों में व्यवस्थित करने की होड़ लिए
निश्चित समय में पहला
उपक्रम रहा
मन अभी भी सरसों के खेतों में रमा रहा
माँ आज उदास सी कमरे में
अलाव तापती हुई
यह कहती रही पिता की नजरों में कभी नहीं आई
उनका मिज़ाज हमेशा से अलग रहा
सबसे अलग जिंदगी कटी तुम सबमे यह पाकर आने वाली जिंदगी की नई डोर हो
मुझसे जुड़े हुए हो
माँ का मिज़ाज बेहद संजीदा रहा फ़र्क मिज़ाज सदैव से अलग रहा ।