हिजाब धार्मिक मान्यता की आज़ादी या दक्षिणपन्थी सरकार के सुधारों का विरोध!

सन्त समीर (गांधीवादी समाजसेवी, वरिष्ठ पत्रकार व प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति)

सन्त समीर जी

क्या पहनावे की स्वतन्त्रता के नाम पर सभी सम्प्रदायों या मान्यताओं वाले लोगों को अपने-अपने हिसाब से सब कुछ पहनने की छूट दी जा सकती है? अगर सचमुच लोग अपनी-अपनी साम्प्रदायिक मान्यताओं के हिसाब से पहनावा धारण करके स्कूलों में जाने लगें, तो यक़ीन मानिए इस देश में ऐसे-ऐसे पहनावे मौजूद हैं कि ये हिजाब समर्थक लोग ही एक दिन लट्ठ लेकर ऐसे पहनावों का विरोध करना शुरू कर देंगे। आज जो लोग हिजाब को इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा या स्त्री की व्यक्तिगत रुचि का विषय बताकर अदालत के फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं, उनमें से कई लोगों को मैं जानता हूँ, जो हिन्दुओं में प्रचलित घूँघट की घोर निन्दा करते रहे हैं। इनमें तमाम प्रगतिवादी लोग भी शामिल हैं। कमाल की सोच है कि घूँघट दकियानूसी, पर हिजाब स्त्री की स्वतन्त्रता का प्रतीक! वैसे एक ऐतिहासिक सच्चाई यह भी है कि घूँघट भी अन्ततः हिन्दुत्व की मूल विशेषता नहीं है, यह निश्चित रूप से बाहर से आयातित है। पौराणिक पात्रों में देखेंगे तो सीता, सावित्री, मैत्रेयी, गार्गी, अनसूया, लक्ष्मी, पार्वती के नाम पर भी कहीं परदा या घूँघट जैसी कोई चीज़ नहीं मिलेगी।

भाई लोग स्कूलों के सन्दर्भ में हिजाब को धार्मिक मान्यता की आज़ादी के रूप में देख रहे हैं, जबकि यहाँ धर्म-मज़हब से लेना-देना होना ही नहीं चाहिए। बात स्कूल के यूनीफॉर्म और चेहरा ढँकने की है। साधारण व्यक्ति को भी बताने की ज़रूरत नहीं है कि कम-से-कम पढ़ाई के समय भी अगर अमीर-ग़रीब सारे बच्चे समान दिखाई दें, तो यह बुरी बात नहीं है। यूनीफॉर्म की कल्पना इसीलिए की गई थी। भारत के अतीत में गुरुकुलों में राजा-रङ्क सबके बच्चे एक-जैसे कोपीन पहनते थे। ओवैसी अगर कहते हैं कि हिजाब के भीतर बच्चियों को यूनीफॉर्म पहनने में कोई परेशानी नहीं है, तो ऐसे मूर्खतापूर्ण बयान पर कौन समझाए कि बन्धु, हिजाब धारण करने के बाद यूनिफार्म की क्या कोई प्रासङ्गिकता बची भी रहती है! इससे भी बड़ा सवाल मुँह ढँकने का है। तमाम देशों ने इस तरह से सार्वजनिक स्थानों पर मुँह ढँकने पर प्रतिबन्ध लगा रखा है। बम धमाकों का सामना करने के बाद तो चाड, सीरिया जैसे मुस्लिम बहुल देशों ने भी हिजाब पर प्रतिबन्ध लगा दिया है।

जो लोग हिजाब की दुहाई देकर सवाल उठा रहे हैं कि क्या हिन्दुओं के सिन्दूर, बिन्दी, बिछुआ पर भी पाबन्दी लगाई जाएगी। ऐसे लोगों की बुद्धि पर बलिहारी है। जिन्हें हिजाब और बिन्दी में फ़र्क़ नहीं दिख रहा, उनके लिए आप क्या कह सकते हैं! क्या सिन्दूर, बिन्दी, बिछुआ से भी चेहरा ढँक जाता है या ये चिह्न यूनिफॉर्म के कपड़े को अपने भीतर छिपा लेते हैं? सिन्दूर, बिन्दी और बिछुआ न युद्ध के मैदान में परेशानी पैदा करते हैं और न ही हवाई जहाज का पायलट बनने में। इसके विपरीत, लड़ाई लड़ने की छोड़िए, हिजाब पहनकर कोई स्त्री एक बाइक तक ठीक से नहीं चला सकती। मेरे हिसाब से हिजाब जैसी चीज़ें सिर्फ़ पहनावा नहीं हैं, ये स्त्रियों के लिए पुरुषों के बनाए क़ैदख़ाने का प्रतीक भी हैं। चयन की स्वतन्त्रता का तर्क बकवास है। यह तर्क तभी ठीक माना जा सकता था, जबकि बचपने से हिजाब का संस्कार न मिला होता और सयानेपन में लड़कियाँ सचमुच अपनी इच्छा से इसे पहनने या न पहनने का फ़ैसला लेतीं। इसे कुछ यों समझ सकते हैं कि अगर सौ-दो सौ मुसलमान बच्चियों को पाँच-दस साल हिन्दू घरों में पाला-पोसा जाए और इतनी ही हिन्दू बच्चियों को मुसलमान घरों में पाला-पोसा जाए, तो कहने की ज़रूरत ही नहीं है कि बड़ी होकर हिन्दू बच्चियाँ हिजाब में दिखाई देंगी और मुसलमान बच्चियों को हिजाब देंगे भी तो वे उसे पहनने से इनकार कर देंगी। व्यक्तिगत चयन से ज़्यादा खेल संस्कारों का है। सवाल है कि हम आने वाली पीढ़ियों को कैसा बनाना चाहते हैं?

मुसलमान तो ख़ैर अपनी मान्यता के हिसाब से हिजाब का समर्थन या विरोध करेंगे ही, पर कुछ प्रगतिवादी और स्त्री-विमर्श के झण्डाबरदार क़िस्म के लोग अगर हिजाब को चयन की स्वतन्त्रता का नाम दे रहे हैं, तो उनकी परेशानी यह है कि वे इसे ‘भाजपा बनाम मुसलमान विरोध’ के रूप में देख रहे हैं। उनके हिसाब से दक्षिणपन्थी राज में कोई प्रगतिशील और अच्छा फ़ैसला भला कैसे हो सकता है! विचारधारा की एक ख़ास तरह की मानसिक बीमारी से वे ग्रस्त हैं। बहरहाल, राजनीतिक विरोधों और दुराग्रहों की तात्कालिकता में फँसने की मैं ज़रूरत नहीं समझता।

अचानक मुझे अपनी शादी की घटना याद हो आई है। क़रीब बीस साल पहले जिस इलाक़े में मेरी बरात गई थी, वह मुस्लिम बहुल इलाक़ा था। घरातियों में मुसलमान महिलाएँ भी थीं। मैंने हिन्दुओं के सिन्दूर, घूँघट और मुसलमानों में प्रचलित बुर्क़े पर सवाल उठाए। दिलचस्प कि लगभग दो साल बाद जब मैं पहली बार ससुराल गया तो रास्ते में ही बुर्क़ाधारी दो महिलाओं ने मुझे सबसे पहले पहचाना और मेरा हालचाल पूछा। मैंने स्पष्ट महसूस किया कि मुसलमान महिलाएँ भी खुली आँखों से दुनिया देखना चाहती हैं, पर सामाजिक दबावों में मन को दबाकर जीना उनकी विवशता है। संस्कारों के वशीभूत जिनका दिमाग़ खुल ही नहीं पाया है, उनकी तो ख़ैर बात ही अलग है।

अन्तिम बात यह कि हिजाब का आन्दोलन चला रही मुसलमान बच्चियों ने ख़ुद कहा है या उनसे कहलवाया गया है कि हिजाब पहनना उनके लिए पढ़ाई-लिखाई करने से ज़्यादा ज़रूरी है। मैं जानना चाहता हूँ कि स्त्री आज़ादी के पक्षधर लोगों की इस पर क्या राय है?

ख़ैर छोड़िए भी। इतनी भी क्या चिन्ता, हिजाब का वजूद कोई ख़त्म तो हो नहीं रहा? बात बस स्कूल के भीतर की है, बाहर आप ज़ोर-ज़ोर से गा ही सकते हैं कि ‘चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में…’।