इच्छाशक्ति प्रबल हो तो हिन्दी राष्ट्रभाषा बन सकती है : डॉ०पृथ्वीनाथ

२९ फ़रवरी को हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की ओर से राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, सोलन (हिमाचलप्रदेश) के सभागार में ‘एक राष्ट्र-एक भाषा’ विषयक राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन हुआ, जिसमें देश के सुदूर अंचलों से आये हुए विषय-विशेषज्ञों की भागीदारी थी।

प्रयागराज (उत्तरप्रदेश) से पधारे लब्ध-प्रतिष्ठ भाषाविद् और समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने विशिष्ट वक्ता के रूप में सम्बोधित करते हुए कहा,”हम भारतीयों को एक बीमारी है, और वह यह कि हम दूसरों की लकीरों से छेड़छाड़ करते हैं; दूसरों की बुद्धि की ओर देखते हैं। आज विश्वस्तर पर हिन्दी का जितना विस्तार है, उतनी अन्य किसी भाषा की नहीं है, उसके बाद भी हम हिन्दी को राष्ट्रभाषा का स्थान दिला पाने में समर्थ नहीं दिखते। कमी यदि है तो इच्छाशक्ति की।” डॉ० पाण्डेय ने आगे बताया,”वर्तमान में हिन्दी विश्व की प्रथम भाषा है, जो सर्वाधिक बोली और समझी जाती है। विश्व के लगभग १६० विश्वविद्यालयों में हिन्दी का शिक्षण-प्रशिक्षण किया जाता है। हमारे आप्रवासी भारतीय सर्वत्र हिन्दी का अलख जगाते आ रहे हैं। ऐसे में, हिन्दी की स्थिति उसके देश में ही विचारणीय और शोचनीय है, जो उसे राष्ट्रभाषा नहीं बनने देती।”

डॉ० योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ ने सभापतित्व भाषण में कहा,”आख़िर क्या हुआ कि देश में आज़ादी से पहले हिन्दी के पक्ष में इतना सुदृढ़ वातावरण होते हुए भी विगत ७० से अधिक वर्षों के बाद भी हम हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा का गौरव क्यों नहीं दे सके हैं।” राजेन्द्र उपाध्याय (दिल्ली) ने कहा,”इस समय अधिकांश काम हिन्दी में हो रहे हैं। देश को एक सूत्र में बाँधने का काम हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में बनाकर करना होगा।” डॉ० एस०एम० इक़बाल (विशाखापट्टनम) ने कहा,”हिन्दी बन्दूक की नोक पर थोपी नहीं जा सकती। इसके लिए हिन्दी को समृद्ध करना होगा। स्कूल-स्तर से हिन्दी को शिक्षा में अनिवार्यत: लागू करना होगा।”

डॉ० अजय शुक्ल (दुमका, झारखण्ड) ने कहा,”हिन्दी को राष्ट्रभाषा न बनने देने में सर्वाधिक घातक भूमिका राजनीति की है, जिस पर हमारे विद्वज्जन को विचार करना होगा।” सम्मेलन के सहायक प्रधानमन्त्री श्यामकृष्ण पाण्डेय ने कहा,”यह हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है, जिसका विपुल साहित्यिक भण्डार है। इस दृष्टि से हिन्दी राष्ट्रभाषा बनने के योग्य है।”

अध्यक्षीय समाहार करते हुए डॉ० सूर्यप्रसाद दीक्षित ने कहा,” विचार करने की बात है कि हमारा राजभाषा-चरित्र कितना प्रासंगिक है। दशकों से राजभाषा के नाम पर हमें छला जा रहा है। आज हमें राजभाषा के विरुद्ध लड़ना होगा।”

अन्त में, सम्मेलन के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने अपने आभार-ज्ञापन में कहा, आज स्थिति विकट है। कुछ कहना बहुत आसान नहीं है। यह देश बहुधर्मी और बहुभाषीय है, इसलिए बहुत ही गम्भीरतापूर्वक हिन्दी के राष्ट्रभाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की दिशा में कार्य करना होगा।

प्रस्तोत्री– मधु भारद्वाज (प्रतिष्ठित कवयित्री)

इस अवसर पर डॉ० उत्तम चौहान, डॉ० मुकेश शर्मा, डॉ० रामकिशोर शर्मा, मधु भारद्वाज, डॉ० प्रभात ओझा, मलखान सिंह, डॉ० शिव प्रसाद शुक्ल, आशुतोष शुक्ल, लक्ष्मीकान्त मिश्र, राजकुमार तिवारी आदिक की समारोह में गौरवपूर्ण समुपस्थिति रही। डॉ० खुशीराम शर्मा ने संचालन किया था।