● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
विश्वस्तर पर प्रतिवर्ष बड़ी संख्या मे विविध प्रकार के दिवस का आयोजन किया जाता रहा है; परन्तु उन दिवस-आयोजन का निहितार्थ क्या है, इसे छोटी संख्या मे ही लोग जानते-समझते आ रहे हैँ। इसका मूल कारण है, चिन्तन और विचारपक्ष का समयसत्य/समयसापेक्ष न होना। इसके लिए एक संकुचित सीमा मे परम्परा-निर्वहण करते रहने की प्रवृत्ति ही उत्तरदायी है।
समसामयिक वार्षिक आयोजन पर दृष्टिनिक्षेपण करना, यहाँ प्रासंगिक है, जोकि पत्रकारिता-क्षेत्र से सम्बन्धित है। हिन्दीपत्रकारिता-दिवस वर्ष का एक आयोजन है, जिसमे पत्रकार-वर्ग को अपने वार्षिक आत्मपरीक्षण करने का एक अवसर मिलता है; परन्तु दु:ख इस विषय का है कि वह आयोजन मात्र शाब्दिक बनकर रह जाता है और पत्रकारेतर जन का आयोजन के रूप मे सिद्ध होता है। बहुत हुआ तो कतिपय पत्रकारीय संघटन के विशेष लोग कुछ घण्टोँ का आयोजन कर, सम्बन्धित विवरण, चित्रादिक प्रकाशित कराकर और समाचारपत्रोँ मे अपना नाम देखकर संतुष्ट हो लेते हैँ। बुद्धिजीवियोँ का एक वर्ग भी ऐसा करके रह जाता है, मानो वह ३० मई की बाट जोह ही रहा हो।
होना यह चाहिए कि हिन्दीपत्रकारिता को उन्नत करने के उद्देश्य से समाचार-सम्पादन- सम्बोध, भाषा आदिक से सम्बन्धित विशेषज्ञोँ को निमन्त्रित किया जाता और समाचारपत्रोँ मे दिख रहे अभाव को दूर करने की दृष्टि से उनसे गहन और विस्तृत परामर्श किया जाता; सम्बन्धित सम्पादक और अन्य समाचारधर्मी मुक्त भाव से अपनी कठिनाई को प्रस्तुत करते और प्रासंगिक सुझाव देते। इसप्रकार निष्कर्ष (निष्पत्ति) के रूप मे समस्त हिन्दी-समाचारपत्रोँ के लिए विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इससे समाज मे एक स्वस्थ और प्रेरणास्पद संदेश सम्प्रेषित होता, साथ ही सौमनस्य का एक अनुकरणीय वातावरण बनता।
अभाव तो हर क्षेत्र मे है; परन्तु जो जनमत बनाने का ज़रिया है, आज उसे ठोस करने की ज़रूरत है। यदि देश के समस्त पत्रकारीय संघटन और हिन्दी-क्षेत्र के समाचारपत्र-पत्रिका-प्रतिष्ठानो की ओर से एक सकारात्मक उद्देश्य-विशेष को ध्यान मे रखते हुए, ३० मई को ‘पत्रकारीय कर्मशाला-दिवस’ के रूप मे आयोजित किया जाता है तो एक स्वस्थ परम्परा का प्रारम्भ माना जायेगा। एक प्रकार से देश मे एक सौमनस्यपूर्ण वातावरण दिखेगा और अविश्वसनीयता की ओर बढ़ रही पत्रकारिता को जनविश्वास और बल प्राप्त होगा। यदि किसी कारणवश, बड़े-से कहलवाने और लगनेवाले समाचारपत्र-प्रतिष्ठानो की इस दिशा मे रुचि न हो तो मझोले (मध्यम) और छोटे (लघु) दिख रहे प्रतिष्ठानो के स्वामियोँ को इस दिशा मे लग जाना चाहिए। इसके अन्तर्गत बिना किसी पूर्व-सूचना के सम्बद्ध समाचारपत्रोँ मे उत्कृष्ट कर्त्तव्यनिर्वहण करनेवाले पत्रकारोँ का वरीयताक्रम मे एक सूची बनाकर सार्वजनिक रूप से सम्मानित भी किया जाना चाहिए। इससे हिन्दीपत्रकारिता-दिवस की सार्थकता सिद्ध होती संलक्षित होगी। इतना ही नहीँ, इस अवसर पर प्रबन्धन, प्रसार, विज्ञापन, मुद्रण आदिक विभागोँ के समर्थ कर्मियोँ (पत्रकारेतर) (‘पत्रकारेत्तर’ अशुद्ध है।) का भी सम्मान करने की परम्परा डाली जानी चाहिए। इससे उन्हेँ भी नैतिक और मनोवैज्ञानिक बल प्राप्त होगा।
हिन्दी-क्षेत्र के समाचारपत्रोँ मे ऐसा एक समाचारपत्र नहीँ है, जिसे भाषाप्रयोग के स्तर पर पूर्णत: शुद्ध माना जाये। इसके प्रति विशेष रूप से पत्रकारिता-जगत् को सजग, सतर्क और सन्नद्ध रहना होगा; क्योँकि सम्प्रेषण मे शब्दप्रयोग का विशेष महत्त्व है। शब्द ब्रह्म है और ब्रह्म आत्मज्ञान, जो स्वयं को समझने के प्रति प्रेरित करता रहता है।
जिनके सद्प्रयास से देश के प्रथम हिन्दीसमाचारपत्र ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ (‘उदंत मार्तंड’ और ‘उदन्त मार्तण्ड’ अशुद्ध हैँ।) का अस्तित्व उभरा, उन युगल (जुगल) किशोर सुकुल (शुक्ल) जी की पत्रकारीय साधना पर परिसंवाद का आयोजन किया जाना, ताकि पत्रकारवर्ग और जनसामान्य मे सुकुल जी के कर्त्तृत्व (‘कृतित्व’ अशुद्ध है।) के प्रति श्रद्धा का भाव जाग्रत् हो सके।
हम मनस्वी प्रारम्भिक पत्रकार, हिन्दीपत्रकारिता के जनक स्मृतिशेष सम्मान्य युगल किशोर सुकुल (शुक्ल) की स्मृति को प्रणाम करते हैँ।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० मई, २०२५ ईसवी।)