कूड़ी के गुलाब

अमित धर्मसिंह-


गमले के गुलाब की तरह नहीं,
हम कुकुरमुत्ते की तरह उगे ।

माली के फव्वारे ने
नहीं सींचीं हमारी जड़ें,
हमारी जड़ों ने
पत्थर का सीना चीरकर
खोजा पानी
कुटज की तरह ।

कुम्हार के हाथों ने नहीं गढ़ा ,
वक़्त के थपेड़ों ने सँवारा हमें ।

किसी की ऊँगली पकड़ने से ज्यादा
हम अपनी ठोकरों से सम्भले ।

हमारी हड्डियों ने कैल्शियम
गोलियों या सिरप से नहीं ,
मिट्टी खाकर प्राप्त किया ।

ज़मीन पर नंगे पाँव चलते
या तसले में
‘करनी’ की करड़-करड़ से
आज भी नहीं
किटकिटाते हमारे दाँत ।

मिट्टी में जन्मे,
मिट्टी में खेले ,
मिट्टी खाकर पले-बढे,
इसलिए मिट्टी से
गहरा रिश्ता है हमारा ।

बेशक आसमान का सितारा
या इंद्रधनुष कोई हो !
ज़मीन पर-
‘कूड़ी के गुलाब’
और
‘गुदड़ी के लाल’
हम ही हैं ।।