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आकांक्षा मिश्रा –
अल्का कोई दस्तक नहीं दी
हैरानी की बात यह राज क्यों रखी ?
खुली पलकों में अल्का देखों
इस मनुष्य को
कभी विफल नहीं हुए निराश क्यों ?
कल्पना के अधीन होकर स्थिर भाव लिए
पीड़ाओं की गोंद में प्रवेश करना
सफलता के द्वार नहीं
जागो और देखों
सुबह धीरे -धीरे दोपहरी में बदलती हुई
साँझ में ढलकर
संसार को खूबसूरत बनाती हुई
भिन्न-भिन्न रंगो से सजाकर
पुनः मनुष्य के आँखों में
कुछ सपनों को चुनने के लिए
फिर से भाव देती रही
एकांत से झरोखे में
इस पूर्ण रात्रि के
परिवर्तित होने में शेष है
तुम परेशान हो कई दिनों से ,
पूछती हूँ कई बार
अब तो बेहद नाराज भी हो
कई बार किसी का जिक्र करना
नाराजगी का होना जायज है
तुम्हे परेशानियों में छोड़ना
मेरी असहजता यूँ बताये बिना
कितने दिनों तक खुद में समेटना
हर भाव का निराकरण है ,
कुछ जीवन तथ्य में डूबी
विस्तृत भावों में जिक्र रहा
जीवन का एकांत
सुलझे हुए दिनों के समीकरण हैं ।
हर सम्भव तुम्हे जानना चाहा
जो गलत रहा
अपनी पहचान में तुम्हे खोजना
कब सही रहा
अलका ये संवाद के बहाने से ।
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