— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
‘क्ष’, ‘त्र’, ‘ज्ञ’ आदिक अक्षर यदि संयुक्ताक्षर हैं तो दोहा-संरचना में ‘दो मात्राओं’ की गणना क्यों नहीं? जब संयुक्ताक्षर के उच्चारण में दो प्रकार की ध्वनि का सम्मिश्रण है तब उनकी अलग-अलग गणना क्यों? क्या वर्ण के अन्तर्गत ‘ध्वनि’ का महत्त्व नहीं?
दोहाकार ‘रेफ़’ की कभी गणना करता है और कभी नहीं; अर्द्धाक्षर की मात्रा को कभी स्वीकार करता है और कभी नहीं। ‘भाषाविज्ञान’ की दृष्टि से ये सभी आपत्तिजनक प्रयोग दोहा के किस शास्त्रीय नियम के अन्तर्गत आते हैं?
ये सभी प्रश्न उनसे उत्तर माँग रहे हैं, जो स्वयं को ‘दोहाकार’ कहते हैं; और हाँ, क्या १३-११ की मात्राओं की पूर्ति ही दोहा की रचना करती है? क्या दोहा में शब्द-सौष्ठव की कोई महत्ता नहीं?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ जुलाई, २०२० ईसवी)