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आवर्त्तन और दरार

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
आग आग से कह रही, दु:ख में भी है सुख।
सुख तो औरों के लिए, बाँध लो गठरी दु:ख।।
दो–
तिनका-तिनका जोड़कर, महल बनाया एक।
आधी घड़ी न सुख मिला, रहने लगे अनेक।।
तीन–
कष्ट मिटाओ लोक से, सुख का ले आधार।
अधरों पर मुसकान ला, गाओ जीवन-सार।।
चार–
सकल विश्व में वेदना, माया सभी सुहाय।
निर्बल को न सताइए, उसकी हाय दु:खाय।।
पाँच–
सुख के पीछे भीड़ है, यही जगत् का खेल।
केर-बेर से दूर रह, कर ले सबसे मेल।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ मई, २०२१ ईसवी।)

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