★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
वर्ष का वर्तमान ‘अतीत’ होनेवाला है। सहज समय-चक्र गतिमान है। हम सब का ‘बहुत कुछ’ कभी न खुलनेवाली एक गठरी मे बाँध कर रख दी गयी है, जिसे मात्र हम याद कर सकते हैं; किन्तु पा नहीं सकते। जर्जर होता वर्षांगोपांग ‘वर्षान्त’ का अवसान समीप देखकर, हमारे कन्धों को अपने हाथों से संस्पर्श करते हुए, हमारे-द्वारा जिये और भोगे गये प्रत्येक क्षण के मृदु और तिक्त कर्मों से साक्षात करा रहा है; इस बात का अनुभव कराते हुए कि वर्ष का क्षण-क्षण अमूल्य है; समय के साथ विश्वासघात करोगे तो भयावह परिणाम भोगने के लिए भी प्रस्तुत रहना।
वक़्त तो हवा का एक झोंका है, जिसे चाह कर भी हम पकड़ नहीं सकते; बेशक, सदुपयोग कर सकते हैं।
इससे पूर्व कि गमन करने की बाट जोह रहा वर्ष हमसे मोह-भंग कर ले; आइए! हम अपने अन्तरात्मा से प्रश्न करें– हमारा कर्म वर्षभर कितना नकारात्मक रहा और क्यों? क्या हम उन नकारात्मक स्थितियों से स्वयं को अलग नहीं कर सकते थे? उसके लिए हम किस हद तक ज़िम्मादार रहे हैं ?
हमे भूलना नहीं चाहिए कि हमारा अतीत जिस भाँति हमारे मस्तिष्क मे पैठा रहता है, उसी भाँति हमारा साथ छोड़ने के लिए सन्नद्ध और तत्पर वर्ष २०२१ हमसे बहुत दूर छिटक जाने के बाद भी अपने पूर्वजसहित हमारे स्मृतिकोश मे संचित रहता है; क्योंकि वह हमारी कर्मकुण्डली को प्रमाणित करनेवाला एक अकाट्य साक्ष्य के रूप मे अपनी अवस्था और स्थिति को दर्शाता रहता है।
तो आइए! हम सभी समादरसहित अपने सहयात्री रहे ‘वर्तमान वर्ष’ को विदा करते हुए, गर्व का अनुभव करें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३१ दिसम्बर, २०२१ ईसवी।)