(पहला भाग)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
इलाहाबाद में भाषाकार, साहित्यकार, विचारक-चिन्तक, विद्वज्जन के शब्दवैभव और अर्थगौरव की एक सुदीर्घ परम्परा रही है। उन्हीं की प्रेरणा से वहाँ अब तक शताधिक सारस्वत केन्द्र गठित हुए हैं और विकसित भी; किन्तु कुछ दशकों से उन संस्थाओं में विकृतियाँ आ गयी हैं; क्योंकि कुछ लोग ने उन्हें अपनी सम्पत्ति बना ली है और वांछित योग्यता न रहने के बाद भी ‘स्वयम्भू’-रूप में अपने कदाचार का परिचय देते हुए, उन सारस्वत केन्द्रों को ‘राजनीति का अड्डा’ बनाकर स्वार्थसिद्धि करते आ रहे हैं।
इस क्रम में ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’, इलाहाबाद शीर्ष पर है। ऐसा इसलिए कि यहाँ पूर्व में जो उदात्त और नीतिपूर्ण पारदर्शी परम्परा रही थी, उसे मात्र एक व्यक्ति ने अपनी ‘अतिरिक्त’ महत्त्वाकांक्षा के कारण ध्वस्त कर दी है। वह व्यक्ति न जाने किस आधार पर ‘मायावती-अखिलेश के शासनकाल से अब तक’ ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ का कोषाध्यक्ष बना बैठा है। आश्चर्य की बात, वह व्यक्ति ‘उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग’ में समीक्षा-अधिकारी के पद पर कार्यरत है और एकेडेमी में कोषाध्यक्ष भी। यह विषय यहीं पर पूर्ण विराम नहीं लेता। कोषाध्यक्ष-पद के रूप में उस व्यक्ति की किस आधार पर नियुक्ति हुई है अथवा मनोनयन, यह तथ्य आज तक पर्द: के पीछे है। जिस तिथि से वह व्यक्ति ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’, इलाहाबाद का कोषाध्यक्ष बना है, उस तिथि से अब तक ‘समीक्षा-अधिकारी’ के रूप में ‘कितने बजे से कितने बजे तक’ उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग के अपने विभाग में वह उपस्थित रहा है, इसकी जाँच होनी चाहिए; क्योंकि अपने कार्यक्षेत्र और कार्यसीमा का दुरुपयोग करते हुए, उस व्यक्ति ने ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ के अन्दर बहुत बड़ी संख्या में कार्यक्रम कराये हैं; तरह-तरह की पुस्तकें सम्पादित की हैं तथा नियमित रूप में प्रकाशित होनेवाली त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन करता आ रहा है। यह भी ज्ञात हुआ है कि वह कोषाध्यक्ष मानदेय के रूप में ५,००० रुपये प्रतिमाह लेता है। एक साथ इतने कार्य कैसे और किसकी कृपादृष्टि के कारण हो रहे हैं? अब इसकी जाँच आवश्यक है। ‘उत्तरप्रदेश लोकसेवा-आयोग’, इलाहाबाद वैसे ही अपनी कर्त्तव्यहीनता और बेईमान नज़रिया के लिए इन दिनों ‘सी० बी० आई० के शिकंजे में है। कितना ही उपयुक्त होगा, यदि सी० बी० आई० उस तथाकथित ‘समीक्षा-अधिकारी’-‘कोषाध्यक्ष’ से भी आवश्यक पूछताछ करे।
वास्तव में, ‘जुगाड़-तन्त्र’ का सहारा लेकर वह व्यक्ति निरंकुश होकर ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’, इलाहाबाद में ‘कोषाध्यक्ष’ के नाम पर एकेडेमी की शीर्ष सत्ता का उपभोग करते हुए, मनमानी करता आ रहा है। वही स्वयंभू अध्यक्ष, संयोजक, कार्यक्रम-अधिकारी, सम्पादक आदिक पदों को धारण किये हुए है। इतना ही नहीं, ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ की ओर से अपनी पुस्तकें प्रकाशित करा चुका है और सर्वाधिक पुस्तकों का अपने नाम से सम्पादन कर, प्रकाशित कराता आ रहा है :– न कोई जानने-समझनेवाला और न ही पूछनेवाला।
नीचे मैंने प्रमाण के रूप में उस कथित कोषाध्यक्ष की ‘कर्मकुण्डली’ प्रस्तुत की है। सच तो यह है कि वह व्यक्ति ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ में सम्पादक, कार्यक्रम-अधिकारी, आयोजक, संयोजक आदिक है; परन्तु उसे ‘एकेडेमी’ की वर्तनी तक नहीं मालूम; उसके पास उपयुक्त भाषिक संस्कार तक नहीं है। तभी तो वह ‘अप्रैल-जून, २०१५ ई०’ के अंक में एकेडेमी की पत्रिका ‘हिन्दुस्तानी’ में अपने सम्पादकीय में कहीं ‘एकेडेमी’ लिखता है तो कहीं ‘एकेडमी’ और भी बहुत कुछ। उसके सम्पादकीय में पर्याप्त अशुद्धियाँ हैं। नीचे उसकी कर्मकुण्डली मैंने प्रस्तुत कर दी है।
‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ की ओर से उस तथाकथित ‘कोषाध्यक्ष’ ने अपने सम्पादन में एक ‘बाल साहित्य विशेषांक’ प्रकाशित कराया था। आश्चर्य! उसे ‘बालसाहित्य-विशेषांक’ तक लिखना नहीं आता। उसकी आँखें अन्धी हो गयी थीं; तभी तो ‘बालसाहित्य-लेखन-प्रकाशन का केन्द्र’ कहलानेवाले इलाहाबाद में उसे मात्र ‘चार बाल-साहित्यकार’ दिखे थे और मात्र दो-तीन बाल-पत्रिकाएँ दिखी थीं, जबकि सम्पूर्ण विश्व में हिन्दी-माध्यम में किसी एक स्थान से सर्वाधिक बाल-पत्रिकाएँ ‘इलाहाबाद नगर’ (उत्तरप्रदेश; भारत) से प्रकाशित हुई हैं। उस बेईमान नज़रियेवाले अयोग्य सम्पादक को बाल-लेखन के अन्तर्गत सर्वाधिक ‘विज्ञान-लेखन’ करनेवाले लेखक नहीं दिख सके थे।
अभी कुछ माह-पूर्व उसने ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ की ओर ऐसे-ऐसे चेहरों को पुरस्कृत किये थे, जिनमें से अधिकतर उसकी चाटुकारिता में लीन रहते हैं और उनकी कोई साहित्यिक उपलब्धि ऐसी नहीं है, जिसके लिए उन्हें सम्मानित किया जा सके। इलाहाबाद के सभी साहित्यकार जानते-समझते हैं कि उसने एक ऐसे तथाकथित कवि-पत्रकार को सम्मानित किया, जिसके बदले में उसने उसके समाचारपत्र में अपने ऊपर अभी हाल ही में ‘विशेषांक’ प्रकाशित कराकर ‘थियोसॉफिकल सोसाइटी ऑव़ इण्डिया’, इलाहाबाद में विमोचन भी करा लिया है; परन्तु इलाहाबाद के साहित्यकार बेचारे गऊ हैं; सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति हैं, तभी तो इलाहाबाद की सारस्वत निधि ध्वस्त हो रही है।
इस तथाकथित कोषाध्यक्ष को अविलम्ब हटाया नहीं गया तो ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ को वह अपनी जेब में लेकर घूमता फिरेगा। वर्षों से हिन्दुस्तानी एकेडेमी में एक योग्य अध्यक्ष की माँग की जा रही थी। कुछ ही दिनों-पूर्व शिक्षाविद् डॉ० उदय प्रताप सिंह के रूप में एकेडेमी को अध्यक्ष मिला है; परन्तु अभी उनकी कार्यशैली आरम्भ नहीं हुई है, इसलिए उन पर कोई टिप्पणी करना उचित नहीं। अध्यक्ष का दायित्व गुरु-गम्भीर हो जाता है और उनसे अपेक्षाएँ भी अधिक हो जाती हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १२ जून, २०१८ ई०)