देश की प्राचीनतम और ऐतिहासिक सारस्वत धरोहरों में से एक इलाहाबाद में स्थित ‘भारती भवन पुस्तकालय’ का आज (१५ दिसम्बर, २०१७ ई०) एक सौ अट्ठाईसवाँ वर्ष-समारोह आयोजित किया गया। इस तथ्य से बहुत कम लोग अवगत हैं कि उस पुस्तकालय से अध्यात्म, संस्कृति, शिक्षा, क्रान्ति, राजनीति इत्यादिक का समवेत सारस्वत स्रोत प्रवहमान है, जिसमें उस पुस्तकालय के उदारमना ब्रजमोहन लाल भल्ला, महामना पं० मदनमोहन मालवीय, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन, पं० बालकृष्ण भट्ट, पं० श्रीधर पाठक, गणेश शंकर विद्यार्थी, महीयसी महादेवी वर्मा आदिक प्रणम्य विभूतियों की समग्र में समुज्ज्वल छवि दिखती है। इसप्रकार बहुत सारे उत्कर्ष-अपकर्ष को साक्षी देता हुआ, १२८ वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यागार ‘भारती भवन पुस्तकालय’ को दक्षिणी इलाहाबाद के चौक भारती भवन मार्ग पर अवस्थित देखा जा सकता है। वहाँ ताड़पत्रों पर लिपिबद्ध कई दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ हैं। इनके अतिरिक्त अन्य दुष्प्राप्य पाण्डुलिपियाँ हैं, जिनकी संरक्षा-सुरक्षा नहीं की गयी तो अति महत्त्व की पाण्डुलिपियाँ विलुप्त हो जायेंगी।
उसी पुस्तकालय के सभागार में आयोजित समारोह में अध्यक्ष अध्यात्मविद्-ज्योतिर्विद् डॉ० रामनरेश त्रिपाठी और मुख्य अतिथि भाषाविद् डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने १२८ दीप प्रज्वलन आरम्भ करते हुए, समारोह का उद्घाटन किया तत्पश्चात् अन्य आगन्तुकों ने शेष दीप जलाये। पुस्तकालय-संस्थापक ब्रज लाल भल्ला के चित्र पर पुष्प-माल्यार्पण करते हुए, गण्यमान अतिथिगण ने अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति की थी। सुरभि त्रिपाठी ने माँ शारदा का स्तवन किया था।
इस अवसर पर पूर्व-निर्धारित विषय : ‘परम्परागत पुस्तकालय : अस्तित्व की तलाश में’ पर एक बौद्धिक परिसंवाद आयोजित किया गया। आयोजन में अध्यक्ष डॉ० रामनरेश त्रिपाठी ने कहा, ” हमारी धरोहरों के प्रति किसी को मोह नहीं है। पूरी-की-पूरी हमारी धरोहर, हमारी विरासत नष्ट हो रही है। यह पुस्तकालय शासकीय अनुदान पर चल रहा है। बड़े-बड़े लोग हैं, जिनसे हमारी आशा है, वह भी पूरी नहीं हो पा रही है। यही कारण है कि अब प्राचीन धरोहरों की संरक्षा-सुरक्षा करना बहुत कठिन हो गया है।”
मुख्य अतिथि डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने वर्तमान पठन-अध्ययन के चरित्र को निरूपित कर, बुद्धिजीवी-वर्ग को सीधे कठघरे में ला खड़ा करते हुए कहा,” १२८ वर्ष का बूढ़ा अपनी शैशवावस्था से वयोवृद्धावस्था तक आबाल वृद्ध नर-नारी का सम्यक् मार्गदर्शन करता आ रहा है परन्तु उसकी जर्जरावस्था पर कारुणिक दृष्टि निक्षेपित करने के लिए इलाहाबाद के बुद्धिजीवियों के पास अवकाश तक नहीं है। यहाँ की दुर्लभ पत्र-पत्रिकाएँ, पुस्तक, पाण्डुलिपि आदिक के संरक्षण करने के प्रति किसी में जागरूकता नहीं है। पुस्तकालय के आस-पास का वातावरण इतना दूषित और बीभत्स है कि इधर कोई आने का साहस नहीं करता, इस दिशा में प्राथमिकता के साथ विचार करने की आवश्यकता है।” मीनूरानी दुबे ने अपने से जुड़े संस्मरण सुनाये थे। समारोह का संयोजन और आभारज्ञापन पुस्तकालय-अध्यक्ष श्री स्वतन्त्र कुमार पाण्डेय ने तथा संचालन डॉ० पूर्णिमा मालवीय ने किया ।