● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
स्वर्ग यहीं है और नरक भी यहीं। कर्म के सम्मुख किसी ‘भौतिक धर्म’ का कहीं कोई अस्तित्व नहीं। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ की यही निष्पत्ति है। जो भी इस विचार से असहमत हो, उसके सम्मुख दो प्रश्न हैं :– (१) कुछ मनुष्य, पशु, पक्षी तथा जन्तु टेढ़े-मेढ़े, विकलांग तथा अद्भुत रूप मे क्यों पैदा होते हैं? (२) वे इस मृत्युलोक मे ही ‘दु:ख और सुख’ के भागी क्यों बनते हैं? मत भूलिए, यहीं कर्म है और फल भी; क्योंकि दोनो एक-दूसरे के पूरक हैं।
गीता, क़ुर्आन, हदीस, बाइबिल तथा गुरु ग्रन्थ साहेब भी मनुष्यता के पोषक हैं। भूखे को भरपेट भोजन दे दो; प्यासे को जीभर जल पिला दो; वस्त्रहीन को वस्त्र ओढ़ा दो तथा अभाव मे ‘भाव’ का दर्शन करा दो, यही सच्ची मनुष्यता है। ‘हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई’ विचार/ मतमात्र हैं। अपनी पृथक् प्रकार की पहचान बनाने के लिए मनुष्य-निर्मित कथित धर्मो (‘धर्मों’ ने अशुद्ध है।) ने एक प्रकार का उपक्रम किया है।
नारद ने जब विष्णु से उनके वास-स्थान को जानना चाहा था तब उन्होंने कहा था,”नाहं वसामि वैकुण्ठे, योगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायन्ति, तिष्ठामि तत्र नारद।” न मै वैकुण्ठ मे रहता हूँ; न योगियों के हृदय मे रहता हूँ। मेरे भक्त मेरा जहाँ कहीं भी स्मरण करते हैं/ मुझे भजते हैं, नारद! मै वहीं प्रकट हो जाता हूँ।
उसी समय से नारद जिधर भी निकल पड़ते थे, “नारायण-नारायण” का गायन करते थे।
फिर कैसा मन्दिर?
जितने भी समुदायों के उपासनास्थल हैं, वहाँ कितने प्रकार के कुकर्म, दुष्कर्म, कदाचार तथा अन्य प्रकार के अपराध किये जाते रहे हैं, वे किसी से छिपे नहीं हैं। कहीं पण्डा, कहीं मुल्ला, कहीं पादरी, तो कहीं ग्रन्थी तो कहीं कोई और समय-समय पर अपने कलुषित और कुत्सित चरित्र के लिए जाने-पहचाने जाते रहे हैं, फिर भी लोग उन अधम और लम्पट धर्माधिकारियों के चरण पखारते आ रहे हैं। लोग की वैसी भक्ति अपने माता-पिता के प्रति रहती तो उससे बड़ा न तो कोई मन्दिर होता; मस्जिद होती; गिरजाघर होता; गुरुद्वारा होता और न ही किसी भी प्रकार का कोई अन्य उपासनास्थल होता।
रामाश्रयी शाखा के प्रवर्त्तक गोस्वामी तुलसीदास ने भारतीय समाज-द्वारा सर्वाधिक पढ़े जानेवाले ग्रन्थ ‘श्री रामचरितमानस’ (यहाँ ‘रामचरितमानस’ अनुपयुक्त शब्द है।) मे एक स्थान पर लिखा है, ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करहि, सो तस फल चाखा।।” (यह जगत् कर्म-प्रधान है। जो जैसा कर्म करेगा, उसे वैसा ही फल प्राप्त होगा।)
यदि किसी भी मत-सम्प्रदाय के ग्रन्थ मे कहीं पर भी ‘हिंसा’, ‘भेद-भाव’, ‘घृणा’ इत्यादिक कुकृत्य करने के लिए उकसाया जाता हो तो उसे जलाकर राख कर देना चाहिए; क्योंकि ‘मनुष्यता’ से बढ़कर कोई ‘धर्म’ नहीं।
आज समाज मे ‘धर्म’ के नाम पर जितने भी प्रकार के पाखण्ड-पोषण किये जा रहे हैं, उनके स्थान पर केवल ‘मानवता’ को प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है, अन्यथा ‘मानव-अस्तित्व’ संकट मे पड़ जायेगा।
मोहम्मद साहिब ने कहा था :–
सारे कर्मो का आधार नीयत (इरादा) है। ग़लत इरादे से किये गये अच्छे कर्म का भी फल अल्लाह नहीं देता।
और अन्त मे, मोहम्मद साहिब के इस उत्तम कथन से विचार-प्रवाह का समापन करना युक्ति-युक्त होगा :–
जाहिल के सामने ‘अक़्ल’ की बात मत करो; पहले वह बहस करेगा और अपनी हार देखकर ‘दुश्मन’ बन जायेगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २७ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)