विकास दुबे का क़ुबूलनामा– मैं सभी पुलिसवालों की हत्या कर उन्हें एक साथ जलाकर साक्ष्य मिटाना चाहता था

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मध्यप्रदेश की पुलिस का कहना है– हमने विकास दुबे को आधिकारिक रूप से गिरिफ़्तार नहीं किया है। ऐसे में, प्रश्न है– विकास दुबे को गिरिफ़्तार किया गया था अथवा शासन और पुलिस की मिलीभगत से उसे नाटकीय ढंग से आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया था? पहले तो मध्यप्रदेश के मुख्यमन्त्री, गृहमन्त्री, उज्जैन-पुलिस आदिक यह कहकर अपनी और मध्यप्रदेश की पुलिस की पीठ ठोंक रहे थे कि हमारी पुलिस ने अपराधी विकास दुबे की गिरिफ़्तारी की है, अब जबकि समूचे देश में इस कायराना और सन्दिग्ध गिरिफ़्तारी की एक स्वर में उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश-शासन तथा उत्तरप्रदेश पुलिस-तन्त्र की भर्त्सना की जा रही है; प्रकरण को सी०बी०आइ० को सौंपने की बात की जा रही है तब विषय बदल दिया गया है। अब उसी उज्जैन-पुलिस का कहना है– विकास दुबे के विरुद्ध मध्यप्रदेश के किसी भी थाने में आपराधिक प्रकरण दर्ज़ नहीं है। उसने गिरिफ़्तार नहीं किया है।

इस प्रकरण में सर्वाधिक चौंकानेवाला तथ्य यह है कि पहले महाकाल मन्दिर का जो सुरक्षाकर्मी और उसके सहयोगी विकास दुबे को पहचानने की बात कही थी, वे विकास दुबे को उत्तरप्रदेश ले जाने के बाद अब ग़ायब हो चुके हैं। ऐसा बताया जा रहा है कि सुरक्षाकर्मियों को नौकरी दिलवानेवाला ठीकेदार का विकास दुबे के साथ सम्बन्ध था।

उज्जैन के सभी वकील उज्जैन-न्यायालय के प्रमुख प्रवेशद्वार पर बैठकर और खड़े होकर विकास दुबे की गिरिफ़्तारी को फ़र्ज़ी बताकर उसे गोली मारने की माँग कर रहे हैं। यही कारण है कि विकास दुबे को न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया गया, जो कि महत्त्वपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया है।

एक तथ्य, जो नेपथ्य में पड़ा है, वह पर्दा उठते ही सामने आ सकता है; और वह यह है कि विकास दुबे को बहकाकर उत्तरप्रदेश-पुलिस उसे स्वयं को गिरिफ़्तार करवाकर बचा लेने का आश्वासन दिया हो, फिर उससे वांछित सारी जानकारी लेने के बाद उसकी हत्या कर देने की कूटनीति बनी हो।

उज्जैन में पुलिस-हिरासत में विकास दुबे ने जो रहस्य उगले हैं, वे बेहद चौंकानेवाले हैं। कानपुर रक्तिम काण्ड में मारे गये पुलिस बल के विकास दुबे के घर जाकर दबिश देने की अग्रिम सूचना विनय तिवारी ने उसे दी थी। पुलिसबल को घेरकर मार डालने और शवों को जलाने की उसकी योजना थी। इसके लिए उसने तेल की पहले से ही व्यवस्था कर ली थी, ताकि कोई आपराधिक साक्ष्य पुलिस के हाथ न लग सके। वह सभी पुलिसकर्मियों की हत्या कर उनके शव एक-के-ऊपर-एक रखकर उन्हें जलाना चाहता था। उसके लिए उसने पचास लीटर ज्वलनशील पदार्थ की व्यवस्था कर ली थी। उसने यह भी स्वीकार किया है– वीरगति-प्राप्त देवेन्द्र मिश्र की टाँग मैंने ही काटी थी। उसने यह भी बताया कि उसे कई राजनेताओं और पुलिस-अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त था। उसके साथ कानपुर के कई थानों की पुलिस थी। रक्तिम काण्ड के बाद उसे राजनीतिक और पुलिस-संरक्षण मिला हुआ था।

कई राज्यों की पुलिस विकास दुबे की खोज कर रही थी। इससे साफ़ हो जाता है कि उस पर सरकार की सरपरस्ती दिख रही है।

बहरहाल, विकास दुबे की स्वीकारोक्ति ईमानदार न्यायिक प्रक्रियाओं की समाप्ति पर उसे ‘मौत के फन्दे’ से नहीं बचा सकती।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ जुलाई, २०२० ईसवी)