असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’

असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतम् गमय। ओम शांति शांति शांतिः।

हे परमात्मा मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।

वृहदारण्योकोपनिषद् का यही श्लोक है, जो पूरे विश्व को दीपावली मनाने के लिए आकर्षित करता है।

माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा राम जब चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। तो उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए थे। तभी से हर वर्ष यह प्रकाशोत्सव मनाया जाता है। तभी तो दीप प्रज्वलन करते हुए प्रार्थना की जाती है–

दीपज्योतिः परम् ज्योतिः दीपज्योतिः जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापम् दीपज्योतिः नमोस्तुते।।

भारतीय संस्कृति पाप के शमन और प्रकाश के प्रकीर्णन की वकालत करती है। आत्मा के अन्धकार को दूर कर वहाँ उजास भरने को प्रेरित करने के लिए ही दीपावली के त्यौहार का सर्जन किया गया।

दुनियाभर के लोग के लिए हिन्दू-संस्कृति को समझने का ये एक अच्छा अवसर होता है। दीपों के इस पाँच दिवसीय पर्व पर हम पूरी मानवता के प्रकाशमय जीवन की मंगलकामना करते हैं।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित दुख भागभवेत्।